समाज शास्त्र की अध्ययन पद्धतियां

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समाज शास्त्र की अध्ययन पद्धतियां 

समाज शास्त्र की अध्ययन पद्धतियां का मतलब है कि ,

समाज शास्त्र के अध्ययन  का तरीका क्या है ?

अर्थात हम किस तरह समाजशास्त्रीय ज्ञान का उपयोग करें ,

ताकि हमें समाज शास्त्रीय निष्कर्ष प्राप्त हों?

ध्यान दें समाज शास्त्र में अमूर्त घटनाओं के अध्ययन के लिए गुणात्मक पद्धतियों तथा ,

मूर्त  घटनाओं   के अध्ययन के लिए परिमाणातमक पद्धतियों  का प्रयोग किया जाता है ।

समाज शास्त्र में अमूर्त तथ्यों के अंतर्गत

●सामाजिक मूल्य ।

●धारणाएं ।

●विश्वास ।

● प्रवृत्ति आदि हैं ।

सामाजिक संरचना का प्रथम प्रयोग हर्बर्ट स्पेंसर ने  किया था।

वर्ष 1906 में समाज शास्त्र में संरचना प्रकार्यातमक पद्धति का विकास हुआ था। 

समाज शास्त्र में प्रकार्य की अवधारणा का प्रथम प्रयोग दुरखीम ने किया था ।

समाज शास्त्र की पद्धतियां 

समाज शास्त्र में दो पद्धतियां हैं, गुणात्मक तथा परिमाणातमक ।

गुणात्मक पद्धति के अंतर्गत भी निम्नलिखित पद्धतियां पाई जाती हैं ।

जैसे

●आगमन एवं नियमन पद्धति ।

●वैयक्तिक जीवन अध्ययन पद्धति ।●समाज मिति।

●सामाजिक दूरी का पैमाना ।●सामुदायिक अध्ययन पद्धति ।

आगमन निगमन

समाज शास्त्र में आगमन निगमन पद्धति का  विशेष महत्व है ।

आगमन पद्धति विशिष्ट से सामान्य की ओर ले जाने वाली पद्धति है ।

वहीं निगमन पद्धति सामान्य से विशिष्ट की ओर ले जाती है ।

पद्धति वैयक्तिक जीवन अध्ययन पद्धति 

समाज शास्त्र में बीसेंज एवं बीसेंज के अनुसार ,

वैयक्तिक अध्ययन पद्धति गुणात्मक विश्लेषण का वह रूप है ,

जिसमें एक व्यक्ति एक परिस्थिति या एक संस्था का सावधानी  के साथ,अध्ययन करता  है।

सूक्ष्म वैयकतिक अध्ययन पद्धति को सूक्ष्म दर्शी पद्धति के नाम से भी जाना जाता है ।

वैयक्तिक अध्ययन पद्धति के द्वारा अध्ययन करते समय ,

किसी भी सामाजिक इकाई को ठीक से जानने के लिए यह आवश्यक है,

कि अध्ययन कर्ता अपने आप को उसके साथ एक कर ले तथा उसमें पूरी तरह घुल मिल जाए ।

 समाज मिति

गुणात्मक एवं संखयातमक दोनों ही प्रकिया के अध्ययनों के लिए ,

समाज मिति एक अच्छी पद्धति है ।

सर्वप्रथम मोरनियो ने अपनी पुस्तक हू शैल सर्वे में इस पद्धति का उल्लेख किया था ।

समाज मिति में अभिमान व्यवस्था पर जोर दिया गया है ।

समाज मिति पद्धति के द्वारा समाज चित्र अथवा समाज सारिणी की ,

सहायता से तथ्यों की व्याख्या एवं स्पष्ट किया जाता है ।

सामाजिक दूरी का पैमाना

सामने दूरी का पैमाना भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है ।

बोगारडस ने सामाजिक दूरी पैमाना की स्थापना की थी ।

जान हार्वर्ड, चार्ल्स बूथ, राउटली,आर्थर बाउले ,बार्नर , मिअंटन,

कार्डिनर आदि विद्वानों ने खुद को सामाजिक सर्वेक्षण पद्धति के साथ जोड़ा है ।

सामुदायिक अध्ययन पद्धतियां

सामाजिक विज्ञान में सामुदायिक अध्ययन पद्धति का विस्तृत स्वरूप है ।

इसमें स्थानीय समुदायों को अध्ययन का केन्द्र बनाया जाता है ।

किसी एक विशिष्ट समुदाय के सामाजिक, आर्थिक,

और राजनीतिक प्रवृत्तियों के आधार पर विकासात्मक संभावनाओं का मूल्यांकन किया जाता है ।

इस अध्ययन प्रणाली में समुदाय को एक मूल्यांकन संसाधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है ।

यह अध्ययन प्रणाली  शुंग तथा बेरी के अनुसार सर्वाधिक प्रभाव शाली प्रणाली है ।

इससे सामाजिक विकास की गति का पता चलता है ।

मुथ तथा सेनेस ने सबसे पहली बार सामुदायिक अध्ययन पद्धति का सिद्धांत दिया था ।

उनके अनुसार समुदाय सामुदायिक अध्ययन पद्धति के माध्यम से ,

समाज शास्त्र के अध्ययन का महत्वपूर्ण आयाम है ।

परिमाणातमक पद्धति

सामाजिक अध्ययन पध्दति में इस पद्धति के अंतर्गत निम्नलिखित क्रम पाया जाता है;

●सामाजिक सर्वेक्षण पद्धति ।●सांख्यिकी पद्धति ।

●ऐतिहासिक पध्दति ।

●तुलनात्मक पद्धति ।

●संरचनात्मक प्रकारातमक पद्धति ।

सामाजिक सर्वेक्षण पद्धति

एस एम हैरिसन के अनुसार सामाजिक सर्वेक्षण एक सहकारी पद्धति है ।

इसके अंतर्गत किसी भौगोलिक क्षेत्र में पाई जाने वाली ,

सामाजिक दशाओं  एवं समस्याओं का अध्ययन किया जाता है ।

ई डब्ल्यू बर्गस के अनुसार किसी समुदाय का सर्वेक्षण ,

सामाजिक विकास का रचनात्मक कार्यक्रम प्रस्तुत करने हेतु ,

उसकी दशाओं तथा आवश्यकताओं का वैज्ञानिक अध्ययन है ।

सामाजिक सर्वेक्षण के द्वारा तीन तथ्यों का पता लगाया जाता है, जो इस प्रकार हैं ।

●किसी भी प्रकार के भौगोलिक क्षेत्र में सामाजिक जीवन के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त होती है ।

●किसी सामाजिक घटना या समस्या के बारे में जानकारी प्राप्त होती है ।

●समाज सुधार एवं प्रगति हेतु रचनात्मक कार्यों की ओर ध्यान दिया जाता है ।

सामाजिक सर्वेक्षण के प्रमुख चरण इस प्रकार हैं :

●प्रयोजन या उद्देश्य की परिभाषा ।●परिभाषा का अध्ययन ।

●क्रमबद्ध तरीके है समस्याओं का विशले।

● अध्ययन के क्षेत्र या सम्भावनाओं का परिसीमन ।

● सभी दस्तावेजी स्रोतों का परीक्षण ।

● क्षेत्र कार्य

● आंकड़ों की व्यवस्था ,सारिणी करण और सांख्यिकीय विश्लेषण ।

● परिणाम की व्याख्या ।

● सम्प्राप्प्ति

● चित्र निरूपण ।

सांख्यिकी पद्धति

किसी समुदाय के सर्वेक्षण तथा अध्ययन के लिए सांख्यिकीय, 

आंकड़ों का उपयोग बेहद महत्वपूर्ण होता है ।

इसके माध्यम से समुदाय की गतिविधि का आकलन प्रभावी ढंग से किया जाता है ।

इसमें आंकड़ों का सारिणी करण तथा विश्लेषण करके ,

तुलनात्मक पध्दति का सहारा लेते हुए सामुदायिक विकास की,

प्रक्रिया का समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जाता है।

 ■Bykpsingh ■

    20 042018

 

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