अद्भुत, अतुलनीय, अविश्वसनीय गामा पहलवान

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अद्भुत, अतुलनीय,  अविश्वसनीय गामा     पहलवान 

अद्भुत, अतुलनीय,, अविश्वसनीय गामा पहलवान की कहानी,

अद्भुत से भी अद्भुत है

अतुलनीय से भी अतुलनीय है

अविश्वसनीय से कहीं ज्यादा अविश्वसनीय है।

आप कहेंगे यह कौन सी बात हुई अद्भुत से भी अद्भुत क्या कोई हो सकता है???

मेरा जवाब है जी हां,

अद्भुत से भी कोई अद्भुत था,

अतुलनीय से भी कोई अतुलनीय था

अविश्वसनीय से भी कोई अविश्वसनीय था।

दोस्तों हम आज अपनी इस पोस्ट में जिस महा नायक की बात कर रहे हैं,

वह है भारत में पैदा हुआ,

पला बढ़ा और पूरी दुनिया को जीतने वाला,

विश्व विजेता गामा पहलवान। 

अद्भुत है गामा   पहलवान की कहानी 

अद्भुत, अतुलनीय, अविश्वसनीय गामा पहलवान की कहानी,

कुछ इस तरह कही जा सकती है कि,

गामा पहलवान दुनिया का एक मात्र पहलवान है जिसे,

पूरी दुनिया में कभी कोई हरा नहीं पाया।

गामा पहलवान अद्भुत ही नहीं अतुलनीय और सच में अविश्वसनीय थे।

गामा पहलवान का असली अथवा पूरा नाम गुलाम मोहम्मद बट था।

गुलाम मोहम्मद का जन्म 15 अक्टूबर 1880 को पंजाब के अमृतसर में हुआ था।

इनकी मृत्यु 23 मई 1960 को लाहौर में हुई थी।

ध्यान रखें इनके जन्म पर कुछ विवाद है

कुछ लोगों के अनुसार इनका जन्म 1878 में हुआ था ।

रुस्तम ए हिंद और रुस्तम ए जमां गुलाम मोहम्मद बट अर्थात्

अद्भुत, अतुलनीय, अविश्वसनीय गामा पहलवान का कैरियर पूरे पचास साल चला,

और आश्चर्य की बात यह है कि वह कभी भी किसी दूसरे पहलवान से हारा नहीं ।

विश्व चैम्पियन तक गामा के डर से भाग खड़े हुए हैं। 

अतुलनीय गामा का कैरियर 

 

अजेय पहलवान गामा का कैरियर बहुत जल्द ही शुरू हो गया था।

18 साल की उम्र में गामा पहलवान को पूरी दुनिया जान चुकी थी।

लेकिन गामा के प्रसिद्ध होने की रोचक कथा है जो इस प्रकार है।

कहते हैं कि गामा पहलवान को नाम, पहचान और सोहरत

1890 में आयोजित जय पुर के दंगल से मिली।

जयपुर के इस दंगल के पहले ही गामा सभी नामचीन पहलवानों को धूल चटा चुके थे, 

बस उनके लिए एक ही व्यक्ति चिंता का विषय था, जिसका नाम था गुजरां वाला के करीम बख्श सुल्तानी।

कहते हैं सुल्तानी और गामा की ऐतिहासिक कुश्ती का आयोजन

लाहौर में किया गया ।

इस कुश्ती को देखने के लिए लोग टूट पड़े।

कहते हैं कि 7 फुट लम्बे करीम बख्श सुल्तानी के सामने

पांच फुट 7 इंच के गामा बच्चा लग रहे थे।

लोगों को पता था कि करीम के सामने गामा नहीं टिक सकेंगे,

लेकिन यह क्या? यहां तो दोनों में कोई भी हारने को जैसे तैयार ही नहीं था।

काफी मसक्कत करनी पड़ी दोनों पहलवानों को लेकिन दोनों एक दूसरे को चित न कर सके।

यह कुश्त बबराबरी पर छूटी गामा के लिए यह बराबरी ही जीत थी।

गामा यद्यपि जीते नहीं थे फिर भी सुल्तानी गामा को हरा नहीं पाए।

फलस्वरूप चारों ओर गामा की जय जय कार होने लगी।

इतना ही नहीं फिर गामा ने पीछे मुड़कर कभी  कुछ नहीं देखा 

बस एक और जीत के अलावा । 

गामा की विदेशी धूम

अद्भुत, अतुलनीय पहलवान गामा 1910 में अपने भाई के साथ लंदन गए।

लंदन में उस समय एक प्रतियोगिता चल रही थी जिसका नाम था,

चैम्पियन आफ चैम्पियनशिप।

लेकिन यह क्या? 

गामा इस प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकते क्योंकि गामा का कद छोटा था।

गामा को बहुत गुस्सा आया और इसी गुस्से में एक एलान कर डाला।

गामा का एलान यह था कि वह किसी भी पहलवान से लड़ सकते हैं

और अगर कोई उनसे जीत गया तो उसे वह खुद इनाम देंगे ।

उस समय दुनिया के कुछ खास चर्चित पहलवानों में स्तानिस्लौस पोलैंड,

फ्रांस के फ्रैंक गाज और अमेरिका के बेंजामिन रोलर का नाम खास था ।

इन नामचीन पहलवानों के लिए यह बड़ी ही  सोचनीय बात थी।

आखिरकार अमेरिका के बेंजामिन रोलर ने गामा पहलवान की चुनौती स्वीकार कर लिया।

पूरी दुनिया इस पर नजर गड़ाए हुए थी कि देखते हैं 

जब रोलर और गामा का आमना सामना होगा तो गामा की नाक कटेगी या रोलर की कटेगी ।

पूरी दुनिया की आंखें उस समय खुली की खुली रह गईं

जब गामा पहलवान विश्व स्तर के अमेरिकी पहलवान रोलर को

पहले राउंड में केवल डेढ़ मिनट में हरा दिया।

इतना ही नहीं दूसरे राउंड में फिर गामा ने रोलर को बमुश्किल दस मिनट में हरा दिया।

पूरी दुनिया सन्न।

गामा ने इस तरह रोलर के बाद एक एक करके 12 पहलवानों को धूल चटा दी। 

 और फिर जब भागा      विश्व विजेता 

गामा पहलवान जो कल तक प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकते थे

आज वह पूरी प्रतियोगिता पर छा गए थे।

10 सितंबर 1910 के दिन उनका मुकाबला

विश्व चैम्पियन पोलैंड के स्तौनिस्लौस से होना निश्चित हुआ।

सभी लोग यह जानने को बेताब थे कि देखते हैं अब क्या होगा? 

लेकिन यह क्या?

हुआ वही जो किसी ने सोचा भी नहीं था।

गामा ने विश्व चैंपियन को केवल 1 मिनट में पटक दिया।

इसके बाद दूसरा राउंड सात दिन बाद रखा गया सात दिन बाद जो हुआ वह बताने लायक भी नहीं है।

सात दिन बाद हुआ यह कि

गामा पहलवान दूसरे राउंड के लिए विश्व चैम्पियन का इंतजार करते रहे

और विश्व चैंपियन फिर कभी गामा के सामने नहीं आए। 

इस प्रकार गामा विश्व चैम्पियन घोषित किए गए । 

अद्भुत गामा 

1947 में जब देश के हालात खराब हो गए थे

तब तक गामा लाहौर की मोहिनी गली में बस चुके थे ।

एक दिन अचानक मोहिनी गली के हिन्दुओं पर मुसलमान हमला बोलने वाले थे,

जब यह बात गामा को पता चली तो उन्होंने यह एलान किया,

“इस गली का हर हिन्दू मेरा भाई है देखता हूँ इन पर कौन हांथ उठाता है?”

एक खुराफाती आगे बढा जरूर

लेकिन गामा के एक मुक्क सेसे वापस नहीं लौटा।

इतना ही नहीं जब कुछ माहौल सही हुआ तो अपने पैसे से गामा ने सभी हिन्दुओं को हिन्दुस्तान भेजा था।

भारत के घनश्याम दास बिड़ला ने गामा को एक मुश्त 2000 रुपए

और प्रति माह 300 रुपए की पेंशन प्रदान की थी।

बडौदा के राजा ने भी गामा की मदद की थी।

कहा जाता है कि बडौदा के संग्रहालय में आज भी एक 1200 किलोग्राम का पत्थर रखा है,

इस पत्थर को 23/12/1902 को उठाकर गामा कुछ दूर तक चले थे।

तो दोस्तों, गामा पहलवान

इस तरह के अद्भुत  अतुलनीय और अविश्वसनीय पहलवान के साथ साथ बेहतरीन इंसान भी थे।। 

धन्यवाद

KPSINGH22072018

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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