कहानी सर्कस की आओ तुम्हें बताएं

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कहानी सर्कस की आओ तुम्हें बताएं 

    

दोस्तों आपने भी अपने बचपन में खूब सर्कस देखा होगा,

या फिर सर्कस को देखने की कोशिश जरूर की होगी ।

देखा होगा तो बहुत मजा आया होगा और यदि नहीं देखा होगा तो गुस्सा आया होगा,

खैर ,छोड़िए सब ;

चलिए आज आप को सर्कस के ही बारें में कुछ बताने की कोशिश करते हैं ।

मुझे यकीन है आप यदि इस लेख को मन से पूरा पूरा पढेंगे तो मेरा दावा है,

आप जरूर न केवल खुश होंगे ,बल्कि अपने बचपन की भी याद ताजा कर लेंगे ।

किसे कहते हैं सर्कस 

किसे कहते हैं सर्कस का जवाब यह है कि जब कोई व्यक्ति ,

शारीरिक करतब दिखा कर लोगों का मनोरंजन करता है ,

तो इसे सर्कस कहा जाता है ।

समय के साथ इसमें पशु पक्षियों को भी शामिल करके मनोरंजन को और भी रुचिकर बनाया गया है ।

यह बात दीगर है कि अब सर्कस बि लुप्त प्राय  होने की कगार पर हैं ,

क्योंकि  पशु पक्षी यानी वन्यजीव अधिनियम,

इस तरह से पशु, पक्षी अत्याचार का समर्थन नहीं करता ।

 कब हुई सर्कस की शुरुआत 

कलाबाजी दिखा कर दर्शकों का मनोरंजन करने की कला ,

अर्थात सर्कस का प्रचलन दुनिया में काफी पुराना है ।

वैसे आधुनिक दुनिया की बात करें तो इसकी ,

शुरुआत 1768 में फिलिप एशले द्वारा लंदन में की गई थी ।

एशले घुड़सवारी के करतब लोगों को दिखाते थे ।

लोग भी इसे खूब सराहते थे ।

समय के साथ करतबों की इस महफिल यानी सर्कस में कई चीजें शामिल की गईं ।

हवा में झूलना ,पशु पक्षियों को नचाना  रस्सी में चलना आदि।

भारत में सर्कस की शुरुआत 

जहां तक भारत में सर्कस की शुरुआत की बात है तो ,

सन् 1880 में ग्रेट इंडियन सर्कस की स्थापना को ही,

भारत में सर्कस की शुरुआत मानी जाती है ।

इसकी स्थापना महाराष्ट्र के कुरुवदन के राजा के प्रसिद्ध घुड़सवार ‘विष्णु पंत मोरेशवर छत्रे ने की थी ।

इस सर्कस में पंत खुद घुड़सवारी के करतब दिखाया करते थे ।

उनकी पत्नी टरैपेजी कलाकार और पशु प्रशिक्षक की भूमिका निभाती थीं ।

पंत के सर्कस ने देश विदेश में धूम मचा दी थी ।

श्रीलंका तथा दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में पंत का द ग्रेट इंडियन सर्कस खूब नाम कमाने लगा था ।

आगे चलकर केरल के प्राचीन मार्शल आर्ट कलारी पट्टू और ,

जिमनास्टिक के प्रशिक्षक कुन्ही कन्ह ने 1901 में

सर्कस के कलाकारों को प्रशिक्षण देने के लिए कोल्लम में एक स्कूल की स्थापना की थी ।

जहां से प्रशिक्षित कलाकारों ने खुद कई कम्पनियों की स्थापना की थी ।

जैसे 1904 में स्थापित ग्रैंड मालाबार सर्कस,

कुन्ही कुनन द्वारा 1922 में स्थापित वाइट वे सर्कस,

1924 में कललन गोपालन द्वारा स्थापित ग्रेट रैमन सर्कस,

ग्रेट लायन सर्कस, ओरिएंटल सर्कस, जेमिनी सर्कस, ग्रेट बाम्बे सर्कस विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं ।

भारतीय सर्कस के पिता 

भारतीय सर्कस के पिता की पदवी कलेरी कुन्ही कननन को दी जाती है ।

कुन्ही की मृत्यु 1939 में हुई थी ।

इसके बाद इनके एक शिष्य ने कुन्ही मेमोरियल सर्कस तथा ,

जिमनास्टिक प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की थी ।

जो आज भी सर्कस कैंसर कलाकारों का प्रशिक्षण स्थल बना हुआ है 

आज की हकीकत क्या है? 

आज की हकीकत यह है कि भारत मे ही नहीं पूरे विश्व में ,

मनोरंजन के बढते आधुनिक साधनों के कारण सर्कस की चमक फीकी पड़ी है ।

भारतीय सर्कस का हाल यह है कि 10 /12 कंपनियां ही अब नाम लेने के लिए बची हैं ।

विष्णु पंत और कुन्ही कन्नन की 135 साल पुरानी परम्परा सर्कस के नाम को ,

आज जिन कंपनियों ने जिंदा कर रखा हुआ है ।

उनमे कुछ नाम लिए जा सकते हैं जैसे जेमिनी सर्कस, ग्रेट बाम्बे सर्कस,

जंबो सर्कस, राज कमल सर्कस, ग्रेट रायल सर्कस आदि ।

 

धन्यवाद

KPSINGH 18042018

 

 

 

 

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