हमारे मील के पत्थर

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हमारे मील के पत्थर 

हमारे मील के पत्थर तो हीरा हैं ।

हमारे मील के पत्थर वो पत्थर हैं जो हमारी आन

बान शान के प्रतीक हैं।

हमारे पद प्रदर्शक हैं, हमारे आज के सबसे बड़े

प्रेरणा स्रोत हैं।

हमारे जीवन के सबसे बड़े सुधारक हैं तो दूसरी

ओर हमारी सबसे बड़ी जीवन शक्ति हैं।

तो आइए मिलते हैं ऐसे ही कुछ नायाब मील के

पत्थरों से जो दुनिया के किसी भी हीरे से कम

कीमती नहीं हैं।

तभी तो जब भी इनकी याद आती है तो मुंह से

अनायास ही निकल आता है कि हमारे मील के पत्थर तो हीरा हैं ।

 

कस्तूरबा गांधी 

कस्तूरबा गांधी हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की

सहचरी ही नहीं

बल्कि सहभागी, सहचरी, सहकर्मी , निजी

सहायक, मंत्रिणी, सहनेत्री

आज्ञाकारी सैनिक  प्रेरणा की स्रोत सभी कुछ थीं।

कस्तूरबा गांधी का जन्म गुजरात के  काठियावाड़

के पोरबंदर नगर में 1869 में हुआ था।

पिता का नाम मानक जी, माता का नाम ब्रज कुंवरि था।

विवाह के समय कस्तूरबा गांधी की उम्र 13 साल

तथा गांधी जी की उम्र 12 साल थी।

प्रारंभिक जीवन में गांधी जी एक अनुदार, जिद्दी,

और ईर्ष्यालु पति थे।

क्रूर व्यवहार भी कर देते थे।

कस्तूरबा गांधी ने इस काल में विशेष धैर्य से काम

लिया।

उनका दक्षिण अफ्रीका गमन भी कोई बहुत सुखद

नहीं था प्रारंभ में।

गांधी जी की अग्नि परीक्षा काल में कस्तूरबा की

परीक्षा भी हो जाती थी।

साधारण घरेलू महिला होकर भी गांधी जी के

साथ धरना प्रदर्शन तक में

कस्तूरबा ने बाकायदा सहभागी की भूमिका निभाई थीं।

कस्तूरबा गांधी ने 1920/1922 ,1930/32

,1942 के

में धरनो और जुलूसों का भी नेतृत्व कर चुकी थीं। 

कस्तूरबा लाठी भी खा चुकी थीं।

कस्तूरबा गांधी जी के साथ न केवल जेल गईं बल्कि

अंतिम समय में भी गांधी जी की जेल साधना की सहभागी थीं। 

साबरमती आश्रम में कस्तूरबा गांधी को साक्षात देवी के रूप में माना जाता था ।

आश्रय में आने जाने वाले कार्यकर्ताओं और

अतिथियों की देखभाल का जिम्मा भी उन्हीं के ऊपर था। 

9 अगस्त 1942 को वह तीसरी बार जेल गई थीं।

इस बार उन्हें महादेव देसाई और गांधी जी के साथ आगा खाँ पैलेस में रखा गया था।

यहीं पर 22 फरवरी 1944 को कस्तूरबा गांधी का निधन हुआ था।

22 फरवरी को भारत में मातृ दिवस मनाया जाता है। 

स्वर्ण कुमारी देवी 

हमारे मील का पत्थर तो सचमुच हीरा हैं।

यह केवल लिखने के लिए प्रयोग किया जाने वाला हीरा नहीं

बल्कि सचमुच के हीरे की बात हो रही है।

जी हां हम स्वर्ण कुमारी देवी की बात कर रहे हैं।

यह देवेन्द्र नाथ ठाकुर की छोटी बेटी और रवींद्र नाथ ठाकुर की बड़ी बहन थीं।

यह अपने परिवार की परंपरा के अनुसार कवियत्री,

उपन्यास कार सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थीं।

भारती नामक पत्रिका की संपादिका होने के नाते वह भारत की पहली संपादिका थीं।

इन्होने पत्रिका के माध्यम से महिलाओं में

जागरूकता तथा देश भक्ति की भरपूर भावना जगाई थी ।

उपन्यास दीप प्रमाण में उनके देश प्रेम को महसूस किया जा सकता है ।

पति पत्नी दोनों कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता थे। 

उनके इस उपन्यास का मुख्य भाव यह था कि एकता में ही राष्ट्र का विकास है।

इनके पति का नाम जानकी दास घोषाल था।

1890 के कलकत्ता अधिवेशन में स्वर्ण कुमारी देवी ने

पंडिता रमा बाई, कादंबिनी गांगुली के साथ भाग लिया था ।

संजीवनी नामक पत्रिका की 10 जनवरी 1891 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 

स्वर्ण कुमारी देवी के प्रयत्नों से महिला

प्रतिनिधियों की संख्या 100 से अधिक हो गई थी।

1932 में उनका देहावसान हुआ था। 

बाई अमन 

हमारे मील के पत्थर तो हीरा हैं इसका जीता जागता प्रमाण है बाई अमन।

इनका वास्तविक नाम अमानी बानो बेगम था।

1919/20 के खिलाफत आंदोलन और प्रथम

असहयोग आंदोलन के समय पंजाब में मे वे एक चर्चित नेत्री थीं ।

यह महान राष्ट्र भक्त मोहम्मद अली, शौकत अली की मां थीं।

इन्होंने अली बंधुओं की गिरफ्तारी के बाद बुर्का

उतार कर जन सभाएं की थीं।

वह अपने भाषण में कहा करती थीं कि वह अंग्रेजों

को याचिका देने में विश्वस नहीं करती हैं ।

महिला मताधिकार को लेकर वह भारत मंत्री के पास तक चली गई थीं  ।

खादी के प्रचार तथा साम्प्रदायिक एकता के लिए उन्होंने बहुत काम किया था।

वह गांव गांव में पंचायतों की स्थापना करना चाहती थीं ।

1922 में उन्होंने शिमला की फैशनेबल महिलाओं तक को

खादी पहनने को मजबूर कर दिया था।

इनका कार्य क्षेत्र पंजाब था लेकिन यह पूरे देश में चक्कर लगाती थीं। 

सच तो यह है कि आज जब भी इन मील के

पत्थरों की तरफ ध्यान जाता है तो अनायास ही

मुख से निकल जाता है कि हमारे मील का पत्थर तो हीरा हैं। 

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 02082018

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