कठपुतली कला क्या है:आओ तुम्हें बताएं

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कठपुतली कला क्या है: आओ तुम्हें बताएं 

कठपुतली कला क्या है: आओ तुम्हें बताएं नामक यह लेख,

दोस्तों मैने बस आप के लिए लिखा है।

जी हां, दोस्तों अगर आप कठपुतली कला के बारे में कुछ भी जानना चाहते हैं,

तो इस लेख को पढने से आप का निश्चित रूप से लाभ हो सकता है।

क्यों कि इस लेख में भारतीय परिप्रेक्ष्य में कठपुतली कला के,

उद्भव और विकास के बारे में काफी कुछ कहा और बताया गया है।

कठपुतली मतलब काठ की गुड़िया

दोस्तों, कठपुतली शब्द का मतलब होता है काठ की गुड़िया।

भारत में कठपुतली के जरिए कहानी सुनाने की प्राचीन परम्परा रही है।

वास्तव में कठपुतली कला एक नाटकीय खेल है,

जिसमें लकड़ी की गाड़ी के माध्यम से जीवन के प्रसंग, लोक कथाएं,

धार्मिक, पौराणिक आख्यान आदि का प्रदर्शन किया जाता है।

कठपुतली को लकड़ी  कागज़ या तो प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनाया जाता है।

बनाते समय इनके शरीर के अंगों को इस प्रकार रखा जाता है कि 

बंधी डोर खींचने पर ये अलग अलग हिल डुल सकें।

हड़प्पा सभ्यता की कठपुतली 

 

हड़प्पा सभ्यता में सिर से अलग हो सकने वाला बैल,

और  ऊपर खिसकने वाले टेराकोटा बंदर के साक्ष्य मिल रहे हैं।

आगे चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में पाणिनी की आषता धोधी में,

नट सूत्रों में पुतला नाटक का उल्लेख किया गया है।

सिंहासन बत्तीसी में भी विक्रमादित्य के सिंहासन की,

बत्तीस पुतलियों का उल्लेख है।

पहले भारत में पारंपरिक पुतली नाटकों की कथावस्तु में,

पौराणिक साहित्य, लोक कथाएं और किवदंतियो को शामिल किया गया था।

 

जैसे अमर सिंह राठौर, पृथ्वीराज चौहान, हीर रांजा, लैला मंजनू, शीरी फराद आदि।

वर्तमान में कठपुतली संसार 

आधुनिक भारत में कुल चार प्रकार की कठपुतली कला का प्रचलन है, ये हैं;

■ दस्ताना कठपुतली।

■ छड़ कठपुतली।

■ छाया  कठपुतली।

■ धागा कठपुतली।

दस्ताना कठपुतली 

दस्ताना कठपुतली दस्तानों की तरह हांथ में पहनी जाती है ।

जिसमें हांथ की भिन्न-भिन्न उंगलियां हांथ व सिर  का  कार्य करती हैं ।

और कठपुतली की स्कर्ट नुमा वेषभूषा कठपुतली चलाने वाले की बांह तक आ जाती है ।

एक कलाकार एक समय में दो कठपुतली को काम में ला सकता है ।

इस दस्ताना कठपुतली के भिन्न प्रकार इस तरह हैं ।

●पव कथकली ।यह केरल में प्रचलित है इसके विषय महाभारत और रामायण हैं ।

● कुधेई नाच ।यह ओडिशा में प्रचलित है ।

छड़ कठपुतली 

इसमें सिर और हांथ तीन जोड़ों द्वारा छड़ो से जुड़े रहते हैं ,

तथा ये छड़े कठपुतली की वेषभूषा के नीचे छिपी रहती हैं ।

इसके प्रमुख प्रकार इस प्रकार हैं ।

●पुतुल नाच ।

यह पश्चिम बंगाल की कठपुतली कला है ।

रामायण और पौराणिक आख्यान इसके विषय होते हैं ।

●कथि कुधेई,यह ओडिशा की कठपुतली है ।

●यमपुरी यह बिहार की कठपुतली है ।

छाया कठपुतली

यह आन्ध्र प्रदेश की कठपुतली कला है ।यह जानवरों की खाल से बनी छिद्रित,रंगीन, छायादार होती हैं ।

इनका प्रदर्शन कपड़े के पीछे से किया जाता है ।

इसके प्रमुख प्रकार इस प्रकार हैं ।

●थोलूबोमलता ।यह आन्ध्र तमिलनाडु की कठपुतली है ।

●तोगली गोअंबे अड्डा ।यह कर्नाटक का छाया नृत्य है ।

चमा दायचे बाहुल्य ।यह महाराष्ट्र में रत्न गिरि से संबंधित है ।

इसमें रामायण के आख्यान का मंचन होता है ।

● रावण छाया .यह ओडिशा की कठपुतली का भव्य मंचन है।

धागा कठपुतली  

भारत में धागे द्वारा कठपुतली के प्रदर्शन की समृद्ध परम्परा रही है।

यह कठपुतली लकड़ी, तार और कपड़े से बनी होता है।

इन्हें आकर्षित बनाया जाता है। हांथों में तार या धागा बंधन होने का कारण यह संचालन में सुगम होता है।

यह बहुत मूवमेंटी कठपुतली है।

● असम में इस कला को पुतल नाच कहते हैं।

● राजस्थान में कठपुतली कला का नाम से जाना जाता है।

● तमिलनाडु की बोम लाटम नामक कठपुतली का प्रदर्शन होता है।

इसके उग्र साहे चार फीट और वजन 8 या 10 किलोग्राम भार होता है।

निसंदे कठपुतली कला महान कला है लेकिन बेहद अफसोस है कि यह कला विलुप्त प्राय हो चली है।

धन्यवाद

KPSINGH 24042018

 

 

         

 

 

 

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