किसे कहते हैं राजकोषीय घाटा ?

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किसे कहते हैं राजकोषीय घाटा 

किसे कहते हैं राजकोषीय घाटा?

यह एक ऐसा सवाल है जिससे प्रत्यक्ष रूप से किसी का  संबंध नहीं दिखता ।

लेकिन अगर इसकी जरा  भी पडताल करें तो पता चलेगा कि,

यह एक दो नहीं बल्कि पूरे देश के हर आदमी से संबंध रखता है।

आर्थिक दृष्टिकोण से इसे अगर समझने की कोई करें तो,

यह भी पता चलता है कि इसके  कम या ज्यादा होने से ,

हमारी-आपकी अर्थ वयवस्था को भी जबरदस्त फर्क  पड़ता है। 

आम बजट में राजकोषीय घाटा

आम बजट का यह बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा होता है

इसीलिए इसे हर आम बजट में खास तवज्जो देने की कोशिश की जाती है।

भारत सरकार ने आम बजट 2018-19 में इसका यानी राजकोट घाटे का लक्ष्य 3•3%रखा है।

याद रखें राजकोट घाटा अधिक होने  से न सिर्फ मंहगाई बढने की संभावना होती है,

बल्कि कर्ज भी मंहगा हो जाता है।

यही वज़ह है कि सरकार अपने खर्च पर नियंत्रण,

और राजस्व में वृद्धि के ज़रिए इस घाटे को काबू में रखने का प्रयास करती है।

ऐसा करते  समय उसे सबसिडी कटौती और टैक्स दर बढाने जैसे,

अलोकप्रिय क़दम उठाने की ज़रूरत होती है। 

समझिए राजकोषीय घाटे को 

किसे कहते हैं राजकोषीय घाटा नामक इस सवाल का जवाब कुछ इस तरह है।

जब कोई सरकार अपने बजट में आमदनी से अधिक खर्च का प्रावधान करती है,

तो उसे डेफिसिट फाइनेंसिंग यानी घाटे का बजट कहते हैं।

ऐसी स्थिति में सरकार घाटे की भरपाई करने के लिए धनराशि उधार लेती है।

ध्यान देने की जरूरत है कि बजट में तीन प्रकार के घाटे का व्ययौर होता है।

● राजकोषीय घाटा। 

●राजस्व घाटा। 

● प्राथमिक घाटा।

“जब राजस्व प्राप्तियों और ॠण भिन्न पूंजीगत (नान डेट कैपिटल) प्राप्तियों का योग ,

सरकार के कुल व्यय  से कम होता है तो वह राजकोषीय घाटा कहलाता है।”

इसे आप सरकार की कुल आय और कुल व्यय में अंतर कह सकते हैं। 

कैसे वयक्त होता है राजकोषीय घाटा 

किसे कहते हैं राजकोषीय घाटा नामक इस सवाल का जवाब जानने के बाद,

सवाल यह है कि राजकोषीय घाटे को किस रूप में वयक्त किया जाता है ?

इसका जवाब यह है कि राजकोषीय घाटे को जीडीपी के अनुपात में वयक्त किया जाता है।

यानी राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में वयक्त किया जाता है।

राजकोषीय घाटा जितना अधिक होगा सरकार

पर कर्ज और व्याज अदायगी का बोझ भी उतना ही बढ़ जाता है।

यही वज़ह है कि सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए ,

सबसिडी और बाक़ी खर्च में कटौती की माला जपने का काम करती हैं ।

यानि सबसिडी और बाक़ी खर्च में कटौती करती हैं।

याद रखें वित्त मंत्रालय हर साल बजट में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य तय करता है। 

राजस्व  घाटे का गणित 

 राजस्व  घाटे का गणित बेहद महत्वपूर्ण है।

यह आम बजट दूसरा  सबसे महत्वपूर्ण घाटा होता है।

अगर राजस्व प्राप्तियों की तुलना में राजस्व व्यय अधिक होता है तो उसे राजस्व घाटा कहते हैं।

वित्त वर्ष 2018/19 में राजस्व घाटा 2•2%रखने का लक्ष्य है।

इसे भी जीडीपी के अनुपात में वयक्त किया जाता है।

राजस्व व्यय के रूप में सरकार कुछ धनराशि पूंजी गत परिसम्पत्तियां,

सृजित करने के लिए अनुदान के रूप में खर्च करती है।

जब इस राशि को राजस्व घाटे से घटा दिया जाता है तो प्रभावी राजस्व घाटा कहते हैं।

राजस्व घाटे में वृद्धि का आकङा एक तरह से सरकार के लिए चेतावनी होता है कि,

या तो सरकार अपना व्यय कम करे या फिर अपनी आय बढ़ाए। 

प्राथमिक घाटे को समझिए 

राजकोषीय घाटे का गणित समझने में आपको आसानी तब होगी ,

जब आप ठीक से प्राथमिक घाटे को समझेंगे ।

सरकार हर साल बजट में एक निश्चित धनराशि का प्रावधान करती है ।

यह धनराशि पूर्व में लिए गए ॠण के व्याज चुकाने के लिए होती है।

इसी व्याज चुकाने वाली राशि को जब,

राजकोषीय घाटे  से घटा दिया जाता है तो उसे प्राथमिक घाटा कहते हैं।

वित्त वर्ष 2018/19 में सरकार ने प्राथमिक घाटा 0•3%रखने का लक्ष्य रखा है।

प्राथमिक घाटा अगर शून्य हो तो इसका मतलब यह है कि,

सरकार ने चालू वित्त वर्ष में तो अपनी आय से अपना खर्च चला लिया है,

लेकिन उसे पुराने कर्ज चुकाने के लिए राजकोषीय घाटे के रूप में उधार लेना पङ रहा है। 

घाटे को पाटने के लिए सरकार क्या करती है 

किसे कहते हैं राजकोषीय घाटा नामक इस सवाल का जवाब जानने समझने के बाद ,

एक और सवाल पैदा होता है कि आखिर कोई

सरकार अपने घाटे को पाटने के लिए क्या क्या करती है?

इसका उत्तर यही है कि सरकार (केन्द्र)घाटे को पाटने के लिए,

बांड और ट्रेजरी बिल ज़ारी करके बाज़ार से उधार लेती है।

भारत में केन्द्र सरकार उधार लेने के लिए बांड यानी,

डेटेड सिक्योरिटीज,और टी बिल दोनों जारी करती है।

जबकि राज्य सरकारें सिर्फ बांड ज़ारी करती हैं,जिन्हें स्टेट डेवलपमेंट लोन कहा जाता है।

दोनों में अंतर यह होता है कि टी बिल एक साल से कम अवधि का होता है।

जबकि बांड दीर्घ अवधि का होता है और इसकी एक फिक्सड या फलोटिंग ब्याज दर होती है,

जिसका भुगतान अंकित मूल्य पर किया जाता है।

धन्यवाद

■KPSINGH ■

09052018

 

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