अटल व्यक्तिव के सात शिखर

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अटल व्यक्तिव के सात शिखर

अटल व्यक्तिव के सात शिखर वास्तव में दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री
श्री अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व के वह उच्च प्रतिमान
अद्वितीय हासिल उपलब्धि के समान हैं जिन्हें साधारण
उपलब्धि नहीं कहा जा सकता है।
दोस्तों आप सब जानते हैं कि
अटल बिहारी वाजपेयी के विराट व्यक्तिव में
एक नहीँ दसियों खूबियां थीं
बावजूद कुछ ऐसी उपलब्धि भी रही हैं
जिनका वर्णन हम सभी के लिए जरूरी है ताकि इस विराट व्यक्तिव के धनी
महामानव की एक झलक को हम भी आत्मसात कर सकें।
तो आइए दोस्तों, अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व को
अपनी नजर से देखें कुछ इस तरह,,, 

आजादी के सिपाही थेअटल 

अटल बिहारी वाजपेयी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के

एक वीर सिपाही के तौर पर जाने जाते हैं।

इन्होंने भी लाठियां खाईं और जेल गए थे।

1942 में यद्यपि उनकी उम्र कम थी लेकिन फिर भी वह बड़ा

साहस करने वाले व्यक्ति थे।

देश की आजादी के लिए वह भी अपना

तनमनधन सब कुछ हर वक्त न्यौछावर करने को

तत्पर रहने वाले व्यक्ति थे। 

जनसंघ और राजनीति की अटल शुरुआत 

श्री अटल बिहारी वाजपेयी आजादी के आंदोलन के दौरान ही

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के संपर्क में आ गए थे।

इसे संयोग ही कहेंगे कि एक सामान्य व्यक्ति को

अनजाने ही विराट महापुरुष का सानिध्य प्राप्त हो चुका था।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में भारतीय जन संघ की स्थापना की थी।

इससे न केवल उनकी अलग पहचान बनी बल्कि देश के राजनीतिक पटल पर

एक अटल ध्रुव व की स्थापना की शुरुआत हुई।

हालांकि अटलबिहारी वाजपेयी ने 1952 मे ही चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई थी

लेकिन किस्मत ने इनका साथ पहली बार 1957 में दिया था।

जब यह बलराम पुर लोक सभा सीट से विजयी हुए थे।

अटल बिहारी वाजपेयी अपने ओजस्वी भाषणों के लिए जाने जाते हैं।

सच कहें तो यह इनके व्यक्तित्व को शिखर में ले जाने का सबसे दिलचस्प सत्य है। 

लोकतंत्र की रक्षा हेतु अटल संघर्ष 

अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए जो

संघर्ष किया है वह अमूल्य और अद्वितीय रहे हैं।

1975 में जब महज संजय गांधी की बेवकूफी भरी बात को आधार मानकर

इंदिरा जी ने देश के लोकतंत्र को बंधक बना लिया था

तब समूचा विपक्ष जिन लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए कुर्बानी दे रहा था 

उनमें अटल बिहारी वाजपेयी भी सिद्दत से शामिल थे।

1977 में हुए आम चुनाव के बाद भारतीय जनसंघ की सरकार बनी थी।

विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह है कि तब अटल

बिहारी वाजपेयी दिल्ली से लोक सभा सदस्य चुने गए थे।

मोरारजी देसाई सरकार में अटल जी तभी विदेश मंत्री बनाए गए थे। 

अटल रणनीति कार

एक जमाना था जब भारत और चीन में हर वक्त हर जगह

हर तरफ, हर समय बस हिन्दी चीनी भाई भाई का जुमला रटा जा रहा था।

लेकिन जिस तरह से चीन ने भारत के साथ धोखा करते हुए

1962 में भारत को परास्त किया था

इसके बाद भारत और चीन के संबंध बेहद तनाव पूर्ण हो गए थे।

इसी तनावपूर्ण स्थिति में विदेश मंत्री की हैसियत

से अटल बिहारी वाजपेयी 1979 में चीन का दौरा किया था।

अटल बिहारी वाजपेयी जी के चीनी दौरे के बाद ही भारत और चीन के बीच

एक बार फिर से संबंध सामान्य हुए थे।

तभी से बाजपेयी जी के कुशल रणनीतिक व्यक्तित को पहचान मिली थी।

🔴इतना ही नहीं चाहे वह 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन हो

या राम मंदिर आंदोलन के समय जनता पार्टी की छवि को बचाने की कुशल कोशिश हो

अथवा 1994 मे कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा का अनुकूल प्रदर्शन हो

सभी मोर्चों पर अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व कमाल का था।

इस बात से कतई इन्कार नहीं किया जा सकता ।

🔴1996 में भाजपा अकेली सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी।

🔴इसके बाद 1998 में भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन को फिर से दुहराया तो

इसके पीछे अटल व्यक्तिव के सात शिखर ही ताकत बने थे। 

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 17082018

10 COMMENTS

  1. देश के सच्चे व वीर सपूत को मेरा कोटि-कोटि नमन।

  2. देश की यह बहुत बड़ी क्षति है,जिसकी कभी भी भरपाई नहीं की जा सकती।
    के० पी० सर कल मैंने एक कमेंट किया था,जिसका मुझे आपकी तरफ से जबाव नहीं मिला।

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