महिलाओं के अधिकार :क्या आपको पता हैं?

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महिलाओं के   अधिकार: क्या आप को पता हैं ? 

महिलाओं के अधिकार :क्या आपको पता हैं?

यह केवल एक सवाल नही है बल्कि आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के ,

अवसर पर इस बात की तहकीकात है ,

कि आप घर परिवार की चिंता के साथ साथ आखिरकार अपनी चिंता कितनी और कैसी करती हैं ।

महिलाओं के अधिकारों से संबंधित इस पोस्ट में हम ,

यह जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर भारतीय संविधान में महिलाओं के कौन कौन से अधिकार हैं?

तो आइए देखते हैं कि भारतीय महिलाओं को भारतीय संविधान ने क्या-क्या अधिकार दिया है? 

कार्यक्षेत्र में आपकी सुरक्षा का अधिकार 

महिलाओं के अधिकार : क्या आपको पता हैं ?

की पड़ताल के लिए जरूरी है कि हम यह जरूर जानें कि ,

वर्क प्लेस यानी कार्य क्षेत्र में एक सामान्य महिला के कौन कौन से विशेष अधिकार होते हैं ।

सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के अनुसार सरकारी और प्राइवेट कार्यालय में किसी भी तरह की ,

मौखिक हिंसा, अश्लील संकेत या छेड़खानी दंडनीय अपराध  है।

समान पद पर कार्यरत महिला और पुरुष का वेतन अगर  असमान है ,

तो पारिश्रमिक अधिनियम के अनुसार,

महिला को पुरुष के समान वेतन देने का स्पष्ट आदेश है ।

कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व लाभ का भी प्रावधान है ।

इसमें प्रसूति सुविधा अधिनियम 1961 के अनुसार महिलाओं को तीन माह और छः माह,

वेतन सहित अवकाश देने का आदेश है ।

इससे भी आगे यदि वह बिना वेतन के अवकाश लेना चाहें तो इसका भी नियम है ।

यह अवकाश तीन माह का हो सकता है ।यदि किसी महिला का अवारशन हो जाता है ,

तो मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर एक माह के अवकाश का अधिकार है ।

संपत्ति सम्बंधी अधिकार 

महिलाओं के अधिकार:क्या आप  को पता  हैं?

का दूसरा महत्वपूर्ण बिन्दु है भारतीय संविधान के अनुसार ,

भारतीय महिलाओं को मिले हुए संपत्ति संबंधी अधिकार ।

हिन्दू मैरिज एक्ट 1954  के अनुसार महिलाएं संपति में बंटवारे की मांग नहीं कर सकती थीं ।

लेकिन अब कोपारसेनरी एक्ट के अनुसार उन्हें भी,

अपने पूर्वजों द्वारा अर्जित की गई संपत्ति  मे अपना हिस्सा पाने का अधिकार है ।

विवाहिता हो या अविवाहित अब सभी महिलाओं को ,

अपने पिता की संपत्ति में बराबर का हिस्सा पाने का अधिकार है ।

यहां तक कि विधवा बहू भी अपने श्वसुर से गुजारा भत्ता तथा संपत्ति में  हिस्सा पाने की हकदार है ।

पिता ने खुद की सम्पत्ति की कोई वसीयत नहीं की है,

तो उनकी मृत्यु के बाद,

संपत्ति में लड़की को भी उसके भाइयों  और मां  के समान ही हिस्सा मिलेगा ।

ध्यान रखें यह अधिकार शादी के बाद भी बरकरार रहता है ।

कोई भी महिला अपने हिस्से में आई पैतृक संपत्ति या खुद अर्जित की गई संपत्ति को बेचना चाहे तो,

या किसी और के नाम करना चाहे तो ,

वह स्वतंत्र रूप से ऐसा निर्णय ले सकती है।

पति की मौत के बाद या तो उसकी वसीयत के मुताबिक या फिर वसीयत न होने की स्थिति में भी ,

पत्नी को सम्पत्ति में हिस्सा मिलता है ।

लेकिन शर्त यह है कि पति केवल अपनी खुद की अर्जित की गई संपत्ति की ही वसीयत कर सकता है ।

पुश्तैनी संपत्ति की नहीं ।

हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 के सेक्शन 27 के तहत पति और पत्नी दोनों की जितनी भी संपति है उसके बंटवारे की भी पत्नी मांग कर सकती है।

स्त्री धन पर भी पत्नी पत्नी का पूरा हक होता है ।

अगर पति पत्नी साथ न रहना चाहें तो पत्नी CRPC की  धारा 125 के तहत अपने और बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मांग सकती है ।

अगर मामला तलाक तक पहुंच जाए तो हिन्दू मैरिज एक्ट की धारा 24 के अनुसार मुआवजा राशि तय होती है ,

जो पति के वेतन और उसकी सम्पति के आधार पर तय होती है ।

गरिमा और शालीनता की रक्षा का अधिकार 

अगर किसी महिला को किसी मामले में हिरासत में लिया जाता है तो ,

उसके साथ किसी भी तरह की पूछताछ केवल महिला ही कर सकती है ।

किसी भी महिला को सूर्यास्त के बाद गिरफ्तार नहीं किया जा सकता ।

हालांकि विशेष परिस्थिति में मजिस्ट्रेट का आदेश लाने के बाद यह गिरफ्तारी की जा सकती है ।

एक महिला को पुलिस स्टेशन ले जाने के लिए किसी महिला सिपाही का होना निश्चित है ।

यदि बिना किसी कारण के यह गिरफ्तारी हो रही है तो कारण तुरंत बताना पड़ता है ।

गिरफ्तारी के समय महिला को हथकड़ी न लगाने का नियम है ।

रेप पीड़ित या यौन उत्पीड़न की शिकार महिला का नाम प्रकाशित नही किया जा सकता ।

रेप पीड़ित को मुफ्त में कानूनी मदद का नियम है ।

घरेलू हिंसा और महिला अधिकार

आमतौर पर यह समझा जाता है कि

घरेलू हिंसा कानून किसी महिला के पति से संबंधित है,

लेकिन ऐसा नही है ।

घरेलू हिंसा के मामले मे किसी महिला का कोई भी सम्बंधी आता है ।

घरेलू हिंसा आई पी सी की धारा 498 Aके तहत आती है ।

इसके अनुसार कोई भी महिला किसी भी वक्त इसकी शिकायत दर्ज करा सकती है ।

यह कानून महिला एवं पुरुष सदस्य पर समान रूप से लागू होता है ।

केवल मारपीट ही नहीं ,मानसिक या आर्थिक प्रताड़ना भी घरेलू हिंसा में शामिल है।

किसी महिला को घर से निकालना, उसका वेतन छीन लेना,

नौकरी संबंधी दस्तावेज अपने कब्जे में कर लेना घरेलू हिंसा है ।

घरेलू हिंसा कानून के तहत महिला खुद पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ सीधे न्यायालय जा सकती है ,

इसके लिए महिला को वकील की बाध्यता भी नहीं होती ।

भारतीय दंड संहिता के तहत किसी भी शादी-शुदा महिला को दहेज  के लिए प्रताड़ित करने पर आजीवन कारावास का नियम है ।

हिन्दू विवाह अधिनियम 1995 के तहत कोई भी पत्नी अपने पति से तलाक ले सकती है ।

कोई व्यक्ति बिना महिला की सहमति के उसका अबॉर्शन नहीं करा सकता ।

तलाक के बाद महिला को गुजारा भत्ता, स्त्री  धन और बच्चों की कस्टडी पाने का हक है ।

लेकिन इस बात का फैसला केवल कोर्ट करता है ।

धन्यवाद

लेखक :

के पी सिंह “किर्तीखेड़ा’

08032018 

 

 

 

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