कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना

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कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना

कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना
जी हां दोस्तों,
इस लाइन को सबसे पहले मैंने रेडिओ में सुना था। 
तब नहीं पता था कि यह एक फिल्मी गीत का मुखड़ा है
और जिसे किशोर कुमार ने गाया है।
बाद में इतनी जानकारी तो हो गई कि यह गाना
राजेश खन्ना साहब की फिल्म का है
लेकिन इसका अर्थ या मतलब बिलकुल नहीं पता था।
बहुत दिनों बाद जिंदगी की राहों में कदम रखते ही इस गीत की अचानक याद आ गई
फिर इसे बैठ कर इत्मीनान से सुना
अब इसका अर्थ और मतलब जरा जरा समझ में आने लगा है। 

क्या जिंदगी भी फिल्म है? 

कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना

जी हां दोस्तों

जब भी आप से यह सवाल पूछा जाएगा कि क्या हमारी आपकी

सब की जिंदगी भी फिल्म है?

तो मेरा जवाब यह है कि हां जी, जिंदगी भी एक फिल्म है ।

जहां तक इस गीत की बात है तो इस गीत का सार तत्व यही है कि

आप इस बात की चिंता मत करिए कि लोग क्या कहेंगे

लोग तो कुछ न कुछ कहेंगे ही क्योंकि लोगों का तो काम ही कुछ न कुछ कहना होता है।

आप यह भी कह सकते हैं कि साहब यह तो फिल्म है

हमारा इससे क्या लेना देना 

तो जनाब मेरा कथन यही है कि जिंदगी की हकीकत ही सबसे बड़ी हकीकत होती है

और इस बात से कतई फर्क नहीं पड़ता कि यह

जिंदगी की हकीकत कहां से आ रही है और क्या कह रही है ।

मेरा आपका सबका असली महत्वपूर्ण मकसद यह होना चाहिए कि हम

इस सच्चाई को अपने जीवन में उतार कर इससे काफी कुछ सीख कर अपनी जिंदगी को और भी बेहतर बना सकते हैं।

यह फिल्मी गीत जो संदेश दे रहा है वह एक ऐसा संदेश है

जिसको हम संसार के किसी भी व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण मान सकते हैं। 

क्या आपने यह भी सुना है 

कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना

इस गीत की इन खास पंक्तियों को पूरा करने वाली एक छोटी सी कहानी है।

मुझे विश्वास है कि आप ने वह कहानी चेतना या अचेतना में सुनी जरूर होगी।

सच कहें तो इस कहानी के ही पात्र पात्रों की तरह हमारी अपनी भी कहानी होती है।

यह कहानी इस प्रकार है

कहते हैं कि एक बार एक धोबी

बहुत ज्यादा कपड़े होने की वजह से अपने गधे पर केवल कपड़े लादे था

जबकि खुद पैदल गधे के आगे आगे चल रहा था ।

गधे को और गधे के मालिक दोनों को एक दूसरे से कुछ  भी दिक्कत नहीं थी। 

दोनों मजे से चले आ रहे थे कि रास्ते में कुछ तो लोग कहेंगे,, वाली घटना घट गई ।

हुआ यह कि लोगों ने धोबी को देख कर कहा देखो बेवकूफ़ को

पैदल जा रहा है,  तो धोबी गधे पर बैठ गया।

आगे पहुंचा तो कुछ लोगों ने कहा कि देखो बेवकूफ़ ने

कपड़े तो लाद ही रखे हैं खुद भी लदा हुआ है शर्म भी नहीं आती।

आगे जा कर वह गधे से उतर गए।

इसके आगे की कहानी कहीं भी नहीं लिखी।

आप कोई भी किताब पढ लो इसके आगे की कहानी आपको नहीं मिलेगी।

लेकिन चिंता मत करिए मैं अपनी बात उसी आगे की कहानी से ही खत्म करूंग।

कहानी के आगे की कहानी 

होता यह है कि जब अगले दिन धोबी को फिर उसी रास्ते से

उतने ही भारी बोझ के साथ जाना होता है तो धोबी राम कुछ ऐसा करते हैं कि

अगले दिन उसे सलाह देने वाले नजर नहीं आते।

अगले दिन जब धोबी को उसी रास्त से जाना होता है तो वह

एक नकली बोझ यानी हल्की रुई को भरकर पहले वाले से भी भारी गट्ठर तैयार करता है।

जहां के लोगों ने यह कहा था कि देखो देखो कपड़े भी लादे है और खुद भी बैठा है 

यहां से जब वह निकला तो खुद तो गधे पर बैठा ही था ऊपर से अपने सिर पर वही नकली भारी गट्ठर भी रखे था। इसे देख कर लोगों ने फिर कहा कि देखो क्या गजब हो रहा है ।

धोबी ने कहा यह बोझ मैं तभी उतार सकता हूं जब कोई मेरे पास आए और

मेरा यह बोझ खुद उतार कर अपनी खोपड़ी मे रख ले। या फिर मुझे सलाह देने की कृपा न करे।

इसी तरह जहां पैदल गया था और भार गधे पर 

तो वहां पैदल चलने के अलावा वह नकली बोझ भी लादकर चलने लगा ।

लोगों ने जब कमेंट किया तो वही बात यहाँ भी दुहरा दिया कि

मेरा जो आकर बोझ खुद लेले  वही मुझे सलाह देने की कृपा करें 

कहते हैं आज तक धोबी को सलाह देने वाले उस गली में नजर नहीं आए ।

दोस्तों यह तो एक कहानी है लेकिन हमें इससे यही शिक्षा मिलती है कि

हमें इस तरह के कमेंट या टोकाटाकी से घबराना नहीं चाहिए

बल्कि टोकने या फालतू सलाह देने वालों को सोच समझ कर सुंदर सा जवाब देना चाहिए । 

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 19082018

 

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