क्या आप खुश रहना चाहते हैं?

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क्या आप खुश रहना चाहते हैं? 

क्या आप खुश रहना चाहते हैं?आप इस सवाल को पढकर शायद हंस रहे होंगे?

या फिर यह कह रहे होंगे कि कैसा वाहियात सवाल है,

क्योंकि खुश रहना भला कौन नहीं चाहता?????

हम  यह जानते हैं कि जब हम अपने अंदर से खुश

और संतुष्ट होते हैं तो जीवन अनायास सुखमय हो जाता है।

लेकिन युधिष्ठिर के आश्चर्य से भी बड़ा आश यह है कि हम खुश रहते नहीं।

जानते हैं क्यों खुश नहीं रह पाते?

क्योंकि हमें दूसरों में कमियां निकालने और दूसरों

को कोसने के अलावा,

किसी भी कार्य के लिए समय ही नहीं मिल पाता।

आप को इस बात पर भी आश्चर्य होगा कि आप सचमुच चाहो तो खुश रह सकते हैं।

हकीकत यह है कि यदि हम कुछ छोटी मोटी बातों

को अपने  जीवन में  उतार लें तो हम भी खुश  रह सकते हैं।

खुश रहना कोई मुश्किल काम नहीं है बस मुश्किल

काम यह विश्वास करना है कि हम भी सब खुश रह सकते हैं।

दोस्तों यहां कुछ वही छोटी मोटी बातें प्रस्तुत हैं जो

आपको खुशी दे सकती हैं।

यदि आपने इन्हें अपने जीवन में  उतार लिया जो इस प्रकार हैं,,,,,,,, 

खुश रहना है तो स्वीकार करना सीखें 

किसी भी स्थिति, हालात या इंसान को अपने मूल

रूप में स्वीकार लेने से बहुत सी परेशानियां चालू होने से पहले ही खत्म हो जाती हैैं।

इसका कारण यह है कि जब हम किसी को अपनी इच्छा और जरूरतों के हिसाब से,

बदलने की कोशिश करते हैं तो दिमाग और जीवन में उथल पुथल मच जाती है।

उस समय एक अनकहा सा डर हमारे अंदर ही अंदर आकार लेने लगता है।

उस डर का, कारण यह होता है कि  हमें लगता है

कि अगर सब कुछ हमारे मन के अनुसार न हुआ तो क्या होगा?????

सच कहें तो यही डर हमें वास्तविकता को  स्वीकार कारने से रोकता है।

फलस्वरूप हमारा जीवन और हमारी जिंदगी चिंतामय हो जाती है।

मेरा इस पर सिर्फ  यही  कहना है कि  बिना  किसी

अपेक्षा के यदि हम जीवन के हर पल को खुले दिल

से  स्वीकार  कर लें तो  हम इस  तरह  की व्याधि से बच सकते हैं। 

प्रेम प्रसन्नता की कुंजी है 

सचमुच प्रेम जीवन का सार है।

लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि हम सब व्यर्थ की चिंताओं में, 

इतना रच बस जाते हैं कि दुनिया की किसी भी

अच्छाई या खूबसूरती को महसूस ही नहीं कर पाते।

यहां तक कि इसी उलझी हुई सच्चाई की वजह से

हम अपने बच्चों का परिचय जीवन की तमाम बुरी कठिनाइयों नहीं करा पाते।

इस तरह हम अपने ही लोगों को उनके हिस्से का सत्य नहीं दे पाते।

वैसे अगर हम चाहें तो हम इन सभी स्थितियों को अपने से दूर कर दें पर हम ऐसा नहीं करते। 

लोग क्या कहेंगे 

मनोवैज्ञानिकों और जीव विज्ञान के जानकारों का कहना है कि,

मनुष्य का यह स्वभाव ही है कि वह कुछ भी नया

सोचने से पहले यही सोचता है कि लोग उसके बारे में क्या कहेंगे?

और मजेदार बात यह है कि हर मनुष्य ऐसा सोचता है।

इस सोच का परिणाम यह हुआ कि हम न तो कुछ करते हैं न तो कुछ सोचते हैं।

और फिर इसी कुछ न सोच पाने और  न कर पाने

की वजह से जिंदगी भर मायूस रहने के अलावा कुछ भी नहीं कर पाते।

कहने का मतलब है कि यदि हम दुनिया की बजाय अपनी चिंता ज्यादा करते,

तो कहीं ज्यादा खुश होते अपनी इस जिंदगी में।।।

 

धन्यवाद KPSINGH 04072018

 

 

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