व्यक्ति की सोच ही व्यक्ति का निर्माण करती है

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व्यक्ति की सोच ही व्यक्ति का निर्माण करती है। 

 व्यक्ति की सोच ही व्यक्ति का निर्माण करती है।

कहने का मतलब यह है कि किसी को श्रेष्ठता,जन्म से कतई नहीं मिलती।

वास्तव में किसी व्यक्ति की श्रेष्ठता व्यक्ति की सोच और उसके कर्मों का प्रतिफल होती है।

as you think you become इसका भी मतलब यह है कि जैसा आप सोचेंगे वैसे ही आप बनेंगे।

यह अटल सत्य ही नहीं है बल्कि यह एक ऐसी सच्चाई है जो सभी भ्रमों को भी दूर करती है।

आपने लोगों को यह बात कहते हुए जरूर सुना होगा कि हम जो भी हैं ऊपर वाले की मर्जी से हैं।

ऊपर वाला जैसा चाहेगा वैसा ही होगा, जैसा वह रखेगा वैसे ही रहेंगे।

जब भी इस तरह की बातें की जाती हैं तब ही लोग

एक खास गलती कर देते हैं , इन शब्दों के असली मायने समझने में।

उपरोक्त कथन हकीकत में कुछ और ही कहता है।

वह कहता है कि ऊपर  वाला   कोई हकीकत में ही

किसी आसमां में बैठा  परमात्मा या   परवरदिगार नहीं है।

वास्तव में वह हम सबके भीतर ही मौजूद हमारी

अपनी ही भाव शक्ति, इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति व कर्म शक्ति है।

यही शक्ति हमें प्रतिपल रचती है, और अंततः यह सिद्ध करती है कि हम ही स्वयं के निर्माता हैं। 

  आप की सोच और                    आप

आप ही अपनी सोच से खुद को बनाते हैं, इसे आप इस तरह भी समझ सकते हैं।

जरा सोचिए अगर आप चाहेंगे तभी आप इस लेख को पढ़ सकते हैं,

वर्ना कोई भी आपको यह लेख नहीं पढ़ा सकता।

इसका मतलब यह हुआ कि आप अपनी सोच के मालिक हैं।

आप अपनी सोच के स्वयं जिम्मेदार हैं और अपने  निर्माता हैं।

जरा ठहरिए इस सोच वाली बात से एक बात और सामने आती है कि,

क्या कभी आइंस्टीन ने यह सोचा था कि वह इस सदी का सबसे बड़ा वैज्ञानिक बनेगा?

 

क्या कभी गांधी जानते थे कि वह महान व्यक्ति हैं।

मैंने आपके सामने यह कुतर्क इस लिए रखा है कि

संभव है कि आप भी कुछ इसी तरह सोच रहे होंगे

कि यदि केवल कोई सोचने मात्र से धनवान, रईस,

गुणवान, बुद्धिमान बन जाता तो किसी को कुछ करने की जरूरत ही नहीं है।

वैसे यह सवाल एक कुतर्क है और कुतर्क के लिए जवाब जरूरी नहीं होते।

क्योंकि असली सच्चाई यह है कि सिर्फ सोचने या सोच बदलने में फर्क होता है। 

हमारी सोच और हम

एक कहानी है कि एक बार भगवान् बुद्ध विचरण करते हुए एक नगर पहुंचे।

उन्होंने वहां उपस्थित जानता के समक्ष जो एक प्रवचन दिया।

अपने पूरे प्रवचन में उन्होंने शुरू से अंत तक यही बात दोहराई कि,

जो मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है।

प्रवचन के बाद भगवान् बुद्ध के पास दो व्यक्ति आए।

उनमें से एक ने सवाल किया कि भगवन  यह जो मेरा साथी है,

यह कुत्ते की तरह सोचता है, और ठीक उसी तरह व्यवहार भी करता है।

क्या यह अगले जन्म कुत्ता नहीं बनेगा?

इसके बाद दूसरे व्यक्ति ने अपने साथी के बारे में सवाल पूछा।

उसने कहा भगवान् मेरे साथी की सभी हरकतें बिल्ली जैसी हैं।

क्या यह आगामी जन्म में बिल्ली नहीं होगा?

दोनों लोगों के सवाल सुनने के बाद भगवान् बुद्ध ने जो कुछ भी कहा वह इस प्रकार है,

“यह ठीक है कि जिस प्रकार के तुम्हारे विचार होंगे तुम्हें परिणाम भी उसी के अनुरूप मिलेंगे।

लेकिन खेद की बात यह है कि तुम लोग इस तथ्य का सर्वथा अन्यथा अर्थ निकाल रहे हो।

मेरे प्रवचन का सार यह नहीं है।

आप जैसा सोचते हैं वैसा बनेंगे इसे गहराई और सकारात्मकता से लेने की जरूरत है। 

जो भी हूँ मैं भूत हूं भावों का फल साकार हूं।
किन्तु फिर भी मुक्त मन उत्भाव का संचार हूं।।
धन्यवाद
KPSINGH 17052018

 

 

 

 

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