इच्छा मृत्यु क्या है?

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इच्छा मृत्यु क्या है? 

इच्छा मृत्यु क्या है ?

आइए, इससे भी पहले दुनिया में चिकित्सा पद्धति की गरिमा मय हस्ती ,

के नाम पर बनी हिप्पो क्रेटिक शपथ पर गौर करें ।

“400 बीसी :अगर कोई मरीज कहे, तो भी मैं किसी को जान लेने वाली दवा नहीं दूंगा और न ही किसी को ऐसा करने की सलाह दूंगा “

इच्छा मृत्यु क्या है ?

यह बताने के पहले यह उद्धरण यह बताता है कि पूरी दुनिया में ‘

किसी को मृत्यु देना कभी भी सही नहीं माना गया है ।

इच्छा मृत्यु यानी दया मृत्यु 

 

असहनीय पीड़ा से मुक्ति के लिए जानबूझकर ,

जीवन को समाप्त करने का फैसला लेना ही यूथेनेसिया यानी,

दया मृत्यु या इच्छा मृत्यु की श्रेणी में आता है ।

इच्छा मृत्यु के दो प्रकार हैं,

यानी व्यक्ति की सहमति या असहमति के आधार पर। 

इच्छा मृत्यु को स्वैच्छिक तथा गैर स्वैच्छिक श्रेणी में बांटा जाता है ।

स्वैच्छिक अस्वैच्छिक इच्छामृत्यु 

यदि कोई मरीज असाध्य कष्ट से पीड़ित है और वह अपने जीवन को ,

समाप्त करना चाहता है तो वह डाक्टर की मदद से ऐसा कर सकता है ।

इसे स्वैच्छिक इच्छा मृत्यु कहते हैं ।

 बेल्जियम, लक्जमबर्ग, हॉलैंड  स्विट्जरलैंड, जर्मनी,

और अमेरिका के ओरेगन, वाशिंग्टन राज्यों में इच्छा मृत्यु को  मान्यता प्राप्त  है ।

दूसरी तरफ,

यदि किसी मरीज की ऐसी हालत नहीं है कि वह इच्छा मृत्यु के लिए सहमति दे सके,

तो ऐसी इच्छा मृत्यु को गैर स्वैच्छिक इच्छा मृत्यु कहते हैं ।

हालैंड में विशेष परिस्थिति में  इसके लिए कानूनी प्रावधान है ।

बाकी पूरी दुनिया में यह अवैध है ।

इच्छा मृत्यु के तरीके

जब वास्तव में किसी व्यक्ति को इच्छा मृत्यु देने में ही मानवता की भलाई समझी जाती है,

तब इसे निम्नलिखित तरीकों से सम्पन्न किया जाता है:

●जीवन रक्षक प्रणाली को हटा कर ।प्राकृतिक मौत के लिए छोड़ दिया जाता है ।

●दवाएं बंद कर के ।

●खाना-पीना बंद करके ।

●एक्टिव यूथेनेसिया के अंतर्गत मौत के लिए सीधे कदम उठाए जाते हैं ।

इसमें ही जहरीला इंजेक्शन शामिल है ।

इच्छामृत्यु की चर्चा क्यों?

इच्छा मृत्यु की यहां अचानक चर्चा नहीं हो रही ,बल्कि यहां इसकी चर्चा इस लिए हो रही है क्योंकि,, 

अभी अभी भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी है ।

यानी ,

आज तक भारत में जिस इच्छा मृत्यु को प्रतिबंधित किया गया था ,

उसे सुप्रीम कोर्ट आफ इंडिया ने एक शर्त के साथ बंधन मुक्त कर दिया है ।

सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं सेवी संस्था कामन काज की याचिका पर ,

सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया है कि ,

कोई भी व्यक्ति  लिविंग बिल तैयार करके इसे प्राप्त  कर सकता है ।

क्या है लिविंग बिल

 इसे एडवांस मेडिकल डायरेटिव भी कहा जाता है ।

यह किसी भी व्यक्ति के वे दिशा-निर्देश होते हैं ,

जिसमें वह खुद घोषणा करता है कि भविष्य में ऐसी किसी बीमारी की स्थिति में ,

जिसका इलाज संभव न बचे तो आगे उसका इलाज किया जाए या न किया जाए ।

लिविंग विल का प्रावधान आस्ट्रेलिया मे है ,

जिसमें लोगों को पहले ही यह तय करने की सहूलियत हासिल है

कि भविष्य में उनका इलाज किस तरह से हो अमेरिका में भी कुछ ऐसा ही प्रावधान है। 

जिनकी वजह से आज इच्छामृत्यु की चर्चा है 

 

भारत की बात करें तो सुप्रीम कोर्ट ने जो ऐतिहासिक फैसला दिया है इच्छा मृत्यु पर

तो वह एक दिन का प्रयास नही है ।

आपको बता दें कि इस तरह की मौत मांगने वाली भारत में पहली याचिका

सुप्रीम कोर्ट में 2009 में दायर की गई थी ।

अरुणा शानबाग मुबंई के एक अस्पताल में नर्स थी ,

जिसके साथ अस्पताल के सफाई कर्मी ने 1973 में बलात्कार करने की कोशिश की थी ,

फलस्वरूप अरुणा का दिमाग मृत हो गया था ।

अरुणा 42 साल तक अस्पताल में जिंदा लाश की तरह पड़ी रही ।

यहीं से इच्छा मृत्य पर बहस जारी हुई थी ।

2004 मे आंध्र प्रदेश के शतरंज के खिलाड़ी वेंकटेश की भी ऐसी हालत हो गई थी,

तभी  इच्छा मृत्यु की जरूरत पर बहस हुई थी ।

इसके अलावा हाल-फिलहाल अमेरिका,

स्पेन में भी कुछ ऐसे मामले सामने आए कि पूरे विश्व में

सब बहस चल पड़ी कि इच्छा मृत्य मिलनी चाहिए या नहीं ?

देश परदेश में इच्छामृत्यु के अधिकार की लड़ाई 

भारत का  सुप्रीम कोर्ट  यद्यपि लिविंग बिल के साथ अब इच्छा मृत्यु की स्वीकृति दे चुका है ,

लेकिन यह कम रोचक नहीं है कि इसके लिए पूरी दुनिया में

बहुत पहले से लड़ाई जारी रही है ।

भारत के मामले तथ्यों के आइने में 

●1994 :पी रथिनम बनाम केन्द्र सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के

दो जजों की एक बेंच ने आत्म हत्या के प्रयास को गैर कानूनी बताया था ।

●1996 ज्ञान कौर के मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने

कहा था कि जीवन के अधिकार में मरने का अधिकार शामिल नही है ।

●27 अप्रैल 2005 इंडियन सोसाइटी ऑफ क्रिटिकल केयर मेडिसन द्वारा

 इंड आफ लाइफ विषय पर सेमिनार हुआ ।

●दिल्ली में हुए इस सम्मेलन का कुल मतलब इच्छा मृत्यु की तरफ सहमति का इशारा था ।

●28 अप्रैल 2006 को विधि आयोग ने खुद एक कानूनी मसौदा पेश किया था कि इस पर बहस हो। 

●पिंकी विरानी ने 16 दिसम्बर 2009 को अरुणा शानबाग के मामले को लेकर याचिका डाली थी ।

●2 मार्च 2011 को विरानी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित किया,

तथा 7 मार्च 2011 को एक्टिव यूथेनेसिया की अनुमति दी। 

विश्व पटल पर इच्छामृत्यु पर बहस 

1828 :शुरुआती अमेरिकी संविधान ने आत्म हत्या को गैर कानूनी बताया ।

बाद में इसे न्यूयार्क में लागू किया गया फिर कई राज्यों ने इसे अपनाया ।

1857/1865 अमेरिका में एक आयोग ने आत्म हत्या को गैर कानूनी बताया ।

1935 में इंग्लैंड में यूथेनेसिया सोसाइटी बनी थी ।

1939 में हिटलर ने इसका खुलकर उपयोग किया था ।

1994 अमेरिकी राज्य ओरेगन ने आत्म हत्या को कानूनी मान्यता दी ।

1999 थामस यूक को जहर का इंजेक्शन देने वाले को सजा हुई ।

2002 नीदरलैंड ने इसे कानूनी मान्यता दी ।

13 साल की लडाई पर ऐतिहासिक फैसला 

11 मई 2005  को सुप्रीम कोर्ट ने गरिमा के साथ मृत्यु को

संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार घोषित करने के लिए

कामन काज की याचिका पर केन्द्र को नोटिस जारी किया था ।

इसके बाद इस बहस को अंतिम विराम मिला है 9 मार्च 2018 को जब,

सुप्रीम कोर्ट ने ठीक न होने की कगार में पहुंचे मरीज की लिविंग बिल को मान्यता देते हुए,


निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को लेकर दिशा-निर्देश दिया दिया है ।

फैसले में शामिल जज हैं 

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा

जस्टिस ए एम खानविलकर

जस्टिस अशोक भूषण

जस्टिस ए के सीकरी

जस्टिस डी वाई चंद्र चूड़

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 10032018

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

6 COMMENTS

  1. दुःखों से छूटने के लिए मृत्यु स्वीकारता है जबकि नहीं जानता कि अपने लिए और दुःखों को बढ़ा लेता है।

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