इतिहास का बहुपयोगी प्रश्नकोष

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इतिहास का बहुपयोगी प्रश्नकोष 

इतिहास का बहुपयोगी प्रश्नकोष वास्तव में ऐसा ज्ञान भंडार है,

जिसमें आपको एक नहीँ दो नहीं सैकड़ों ऐसे सवालों के जवाब मिल जाएंगे,

जो जीवन में कहीं न कहीं हमें किसी न किसी परीक्षा में मिल ही जाते हैं।

जिसने जिंदगी में कभी किसी प्रतियोगी परीक्षा में शिरकत नहीं की है,

मैं उसकी बात नहीं करता क्यों कि उसे समझाना बताना आसान नहीं है,

लेकिन जो प्रतियोगी परीक्षा में लगातार शामिल हो रहे हैं,

उन्हें इन सवालों और उनके जवाबों से जरूर कुछ न कुछ मिलेगा।

तो आइए भारत के इतिहास के ही इतिहास से अपनी बात प्रारंभ करते हैं। 

प्राकैतिहासिक काल में मनुष्य 

प्राकैतिहासिक काल अथवा प्रागैतिहासिक काल से तात्पर्य उस काल से है,

जिसकी जानकारी केवल पुरातात्विक साक्ष्यों से ही हो पाती है।

इसके  लिखित साक्ष्य कहीं उपलब्ध नहीं होते हैं।

प्रागैतिहासिक काल में मानव का जीवन पाषाण उपकरणों पर आधारित था।

इसीलिए इस काल को पाषाण काल कहते हैं।

भारत में पाषाण कालीन संस्कृतियों के अनुसंधान  व  खोज के क्षेत्र में,

पहली खोज 1863 में प्राप्त एक पाषाण उपकरण है।

यह खोज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के

अनुसंधान कर्ता राबर्ट ब्रूस ने मद्रास के निकट ही पल्लवरम नामक स्थान में की थी।

पूर्व पाषाण कालीन संस्कृति 

 

पूर्व पषाण काल भारतीय इतिहास में लगभग

35000 ईसा पूर्व से 10000 ईसा पूर्व तक के समय को कहा जाता है।

भारत में इस काल के पाषाण उपकरण विभिन्न स्थानों में प्राप्त हुए हैं।

उत्तर पश्चिमी भारत वर्तमान पाकिस्तान में सोहन नदी घाटी,

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में सिंगरौली घाटी व अन्य,

इलाहाबाद जिले में बेलन घाटी, राजस्थान में डींडवाना क्षेत्र,

मध्य प्रदेश में नरसिंह पुर जिले में, नर्मदा घाटी व भोपाल के निकट भीम बेटका,

महाराष्ट्र में प्रवरा नदी के तट पर नेवासा, आंध्र प्रदेश में गिद्दलूर व करीम पुडी,

तमिलनाडु में चेन्नई के आसपास का क्षेत्र, व इस के अलावा,

कर्नाटक में मालप्रभा व घाट प्रभा नदियों की घाटी

सहित कई स्थानों से पूर्व पाषाण कालीन संस्कृति के अवशेष मिले हैं। 

पूर्व पाषाण कल में मनुष्य 

भारत में पूर्व पाषाण कालीन सबसे प्राचीन चिन्ह 

संस्कृति वर्तमान में सोहन नदी की घाटी में रावल पिंडी के निकट प्राप्त हुई है।

इसे सोहन संस्कृति का नाम दिया गया है। इसमें बटिकाश्म उपकरणों की प्रधानता है।

पूर्व पाषाण काल में मनुष्य प्राकृतिक गुफाओं और शैलाश्रमों में रहता था।

मध्य प्रदेश में भोपाल के निकट भीम बेटका नाम से चर्चित स्थान पर इस काल की गुफाएं हैं।

इस काल में मनुष्य का भोजन शिकार किए गए जानवरों का कच्चा मांस था।

इसके अलावा वनों से प्राप्त कंद व फल फूल भी मनुष्य खाता था।

आखेट और भोजन एकत्र करने के लिए मनुष्य पाषाण उपकरणों के सहारे था।

मनुष्य का निवास नदी, घाटी या कोई जल स्रोत होता था।

मनुष्य का जीवन खानाबदोश और घुमक्कड़ी था।

मध्य पाषाण काल और मनुष्य

पूर्व पाषाण काल और नव पाषाण काल के बीच

का संक्रमण काल इतिहास में मध्य पाषाण काल कहलाता है।

इसका काल क्रम 10000 ईसापूर्व से 5000 ईसापूर्व के मध्य माना जाता है।

इस काल में मनुष्य का मुख्य उद्योग पाषाण उप क

रणों के साथ साथ शल्क अथवा फ्लेक्स से बनें औजार थे।

इस काल के बने औजारों को माइक्रोलिथ कहा जाता है।

सूक्ष्म पाषाण उपकरण इस काल की विशेषता है।

इस काल में मनुष्य अपनी पहले की क्ररियकलाप के अलावा पशुपालन भी करने लगा था।

मनुष्य द्वारा पशुपाल के प्राथमिक साक्ष्य राज

स्थान में बागोर नामक स्थान से और मध्य प्रदेश के आदमगढ  से प्राप्त हुए हैं।

इसी काल में  मनुष्य ने सबसे पहले कुत्ते को अपना प्रथम पालतू बनाया था।

इसी काल में शिकार हेतु मनुष्य ने तीर के बारे में पहली बार सोचा था।

मनुष्य ने समूह में रहना इसी काल में सीखा था। वह अब टोली बनाकर रहने लगा था। 

नव पाषाण काल में मनुष्य 

जिस काल में मनुष्य ने अपेक्षाकृत कुछ विकसित जीवन प्राप्त किया वह नवपाषाण काल है।

इसका काल क्रम 5000 से 2500 ईसापूर्व तक माना जाता है।

कृषि, घर बनाना, बर्तन और पहिए  का उपयोग इसी काल की देन माना जाता है। 

प्रस्तर धातु काल में मनुष्य 

नवपाषाण काल के अंतिम चरण तक मनुष्य ने धातु की खोज कर ली थी।

मानव द्वारा सबसे पहले प्रयुक्त धातु तांबा को ही माना जाता है।

इस काल में पाषाण उपकरण के साथ ही साथ धातु के उपकरण भी बनने लगे थे।

इसी कारण इस काल को धातुप्रस्तरकाल कहा जाता है।

बड़े बड़े गांवों का विकास इसी काल से प्रारंभ माना जाता है।

बड़े पैमाने पर अनाज का उत्पादन इसी काल से प्रारंभ हुआ था।

भारत में प्रस्तर धातु काल की प्रमुख बस्तियां उत्तर

प्रदेश में इलाहाबाद, मिर्जापुर, राजस्थान में बनास

घाटी, आहड, गिलुंद, मध्य प्रदेश में कैथा, एरण

महाराष्ट्र में दायमाबाद, नवदाटोली, इमामगांव आदि जगहों में प्राप्त हुई हैं। 

 

 

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