कब क्यों कैसे हुई 1857 की क्रांति

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कब क्यों कैसे हुई 1857 की क्रांति

 

कब क्यों कैसे हुई 1857 की क्रांति?

यह एक ऐसा सवाल है जो आज भी नई पीढ़ी के लिए सबसे अहम सवाल है।

हमारी नई पीढ़ी जब भी इतिहास का अवलोकन करती है

तो उसे एक नहीँ  अनेकों बार भ्रमित होना पड़ता है।

हमारी नई पीढ़ी जब भी अपनी आजादी की पहली लडाई यानी

कब क्यों कैसे हुई 1857 की क्रांति यह जानना चाहती है तो उसे निराशा ही हाथ लगती है।

जानते हैं क्यों? 

क्यों कि कब क्यों कैसे हुई 1857 की क्रांति?

इस सवाल का सच्चा जवाब आज तक नहीं मिल पाता

कोई कहता है कि यह भारत की आजादी के लिए लडा जाने वाला पहला युद्ध था

तो कोई कहता है कि यह कोई युद्ध नहीं था महज एक क्षणिक सैनिक विद्रोह था।

वास्तव में 1857 की क्रांति की सच्चाई  है आज इस पोस्ट में यही जानने की कोशिश करेंगे।

तो फिर आइए हकीकत में जानते हैं कि कब क्यों कैसे हुई 1857 की क्रांति?

 

कहानी क्रांति की 

1857 की क्रांति को साम्राज्यवादी इतिहास लेखन ने मात्र सैनिक विद्रोह माना है।

सैनिक असंतोष तथा चर्बी लगे कारतूसों के प्रयोग को इस विद्रोह का सबसे बड़ा कारण माना है ।

जबकि हकीकत में हकीकत इसके विपरीत है।

अंग्रजों ने प्लासी के युद्ध से लेकर 1857 तक भारत घोर शोषण किया था।

इस शोषण के खिलाफ अंग्रेजी राज्य की स्थापना से ही विद्रोह होते रहे हैं।

सच्चाई यह है कि 1857 की क्रांति इन्हीं विद्रोहों की चरम परिणति थी।

इस क्रांति के राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक  सामाजिक तथा सैनिक कारण उत्तरदायी रहे हैं।

इनका विवरण इस प्रकार है। 

1857 की क्रांति के राजनीतिक, प्रशासनिक कारण 

कब क्यों कैसे हुई 1857 की क्रांति?

इसे जानने के क्रम में जब हम इसके राजनीतिक व प्रशासनिक कारणों को

जानने की कोशिश करते हैंतो हमें पता चलता है कि

अंग्रेजों ने अपने कुकृत्यों से देशी नरेशों और जनता में असंतोष की ज्वाला पहले ही भर दी थी।

1803 ई से ही मुगल बादशाह को अंग्रेजों ने अपने संरक्षण में ले लिया था। 

लार्ड एमहर्स्ट ने मुगल बादशाह से यह साफ साफ कह दिया था कि,

“आपकी बादशाहत अब नाम मात्र की है, केवल शिष्टता के कारण

आपको बादशाह कहा जाता है।”

आकलैंड ने भी मुगल बादशाह से अपने सारे अधिकार छोडने को कहा था।

लार्ड कैनिंग ने बादशाह को लाल किला छोडने के लिए कहा था 

और साथ में यह भी कहा था कि

मुगल बादशाह बहादुर शाह द्वितीय जफर के बाद बादशाहत समाप्त कर दी जाएगी। 

इन सबसे भारत के मुसलमानों में असं बढता जा रहा था ।

जन सामान्य में भी इन हरकतों का विरोध हो रहा था।

क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने तमाम देशी रियाशतों को जीत कर अपने में मिला लिया था।

फलस्वरूप देशी राजाओं तथा उनकी जनता में असंतोष था। 

डलहौजी की करतूत 

डलहौजी ने  व्यपगत के सिद्धांत अर्थात गोद लेने की प्रथा का निषेध करके

तमाम रियासतों को हडप लिया था।

🔴सतारा, जैतपुर  संभल पुर  बघाट  उदयपुर, झांसी तथा नागपुर

जैसी रियासतें व्यपगत के सिद्धांत से ही कब्जे में ले लिया था।

इन सभी रियासतों में असंतोष था।

अवध को डलहौजी ने कुशासन का आरोप लगाकर हडप लिया था।

पंजाब को उसने युद्ध में जीत लिया था।

सच कहें तो कंपनी की प्रशासनिक व्यवस्था बेहद घटिया स्तर की थी।

कंपनी का एकमात्र उद्देश्य अधिकतम आर्थिक लाभ प्राप्त करना था।

स्थाई तथा स्तमरारी व्यवस्था के कारण नए जमींदारों ने पुराने जमींदारों का स्थान ले लिया था । 

इतिहासकार ताराचंद लिखते हैं, 

“नीलामी में जमींदारी खरीदने वाले आमतौर पर शहर में रहने वाले होते थे

और सिवाय लगान वसूलने और डिक्री इजारा कराने के अलावा कभी गांव नहीं जाते थे।

इसलिए जनता स्वाभाविक रूप से पुराने जमींदारों के साथ थी।

पुराने जमींदारों को भी एहसास हुआ कि उनके पास

अपनी पुरानी स्थिति प्राप्त करने का अच्छा सुअवसर मिला है। “

भारत के लोग भी इस बात से असंतुष्ट थे कि कंपनी के प्रशासन में उन्हें जगह नहीं मिली है ।

भू राजस्व की कड़ई से ववसूली और इसकी ऊंची दरों ने भी किसानों का माथा ठनका रखा था ।

क्योंकि इससे वह दिन पर दिन गरीब होते जा रहे थे। 

सामाजिक, धार्मिक असंतोष 

कब क्यों कैसे हुई 1857 की क्रांति का जवाब बेहद विस्तृत है।

लेकिन हम फिर भी इसका जवाब तमाम माध्यमों से तलाश सकते हैं।

ऐसा ही एक जरिया सामाजिक व धार्मिक असंतोष भी है

जिसके कारण 1857 की क्रांति ने अंगड़ाई ली थी।

क्रांति के कारक तत्वों के सभी वर्गों ने विद्रोह में भाग लिया था।

अंग्रजों ने ययद्यपि कई तरह के लोगों में डर भरे थे लेकिन लोगों में

यह डर सबसे ज्यादा बढ़ गया था कि अंग्रेज उनका धर्म नष्ट करना चाहते हैं ।

विलियम बैंटिक ने कानून बनाकर सती प्रथा, शिशु हत्या, नर हत्या आदि को गैर कानूनी घोषित किया था।

ईसाई मिशनरी ने खुले आम हिन्दू धर्म की आलोचना भी शुरू कर दी थी।

1813 में ईसाई मिशनरी को भारत में धर्म प्रचार की आज्ञा मिली थी, जिसका यह दुरुपयोग था।

इन सब बातों ने भी आग में घी डालने का काम किया था। 

धार्मिक अयोग्यता अधिनियम 

1850 में धार्मिक अयोग्यता अधिनियम पास हुआ तो लोगों ने महसूस किया कि उन्हें ईसाई बनाने की कोशिश की जा रही है ।

इस अधिनियम के अनुसार यदि कोई भी अपना धर्म परिवर्तित कर देता है

तो उसे उसकी पैतृक संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता है।

इस प्रकार धर्म पर ऐसा खतरा भी विद्रह का काकारण बना । 

आर्थिक शोषण 

ईस्ट इंडिया कंपनी की आर्थिक नीतियों ने भी जनता में भयंकर बारूद भरा था।

किसान , दस्तकार, आम जनता बेहद ठगा हुआ महसूस कर रही थी।

अंग्रेजों ने लगान वसूली के लिए बिचौलिए लगा रखे थे ये काले बिचौलिए गोरों से भी ज्यादा हरामी थे।

इनकी अपनी लूटने की चालाकियां थी जिससे जनता त्रस्त थी।

जो जमींदार भू राजस्व जमा करने में देरी करते तो उनकी जमीन सूर्यास्त के नियम से हड़प ली जाती थी।

ब्रिटिश प्रशासक जैक्सन अवध के भूमि अधिकारों की जांच करना चाहता था,

फल स्वरूप एक असंतोष माहौल में व्याप्त था।

बम्बई के ईनाम कमीशन ने लगभग 20 हजार जागीरें जब्त की थीं।

भूमि से बंचित लोग अंग्रेजों के जानी दुश्मन थे।

कुल मिलाकर अंग्रेजों ने भारत को कच्चे माल का स्रोत

साथ ही साथ अंग्रेजी माल का बाजार बना दिया था। अंग्रेजी नीति ने भारत के उद्योग नष्ट किया।

अनौद्यौगीकरण की नीति के कारण जनता भी अंग्रेजों से भरी हुई थी। 

सैनिक असंतोष 

ईस्ट इंडिया कंपनी में भारतीय सैनिक बड़ी संख्या में भर्ती हुए थे।

ये ज्दातर ऊंची जाति के थे।

जब इनके धर्म पर कुठाराघात हुआ तो ये विद्रोहियों में बदल गए।

इनको  यूरोपीय सैनिकों की तुलना में कम वेतन मिलता था।

इनके साथ काफी तरीकों से भेदभाव किया जाता था।

भारतीय सैनिकों को 7/8 रुपये वेतन मिलता था।

इस वेतन में रोजमर्रा की जरूरतें पूरी नहीं होती थीं। घटिया खाना भी दिया जाता था।

भारतीय सैनिकों को बाहर भेजने के बाद भी भत्ता नहीं मिलता था। 

1824 में बैरकपुर की 47 वीं रेजीमेंट ने और

1844 में बंगाल की कई रेजीमेंट ने भत्ते के लिए विद्रह किया था।

बाद में इन्हें भंग कर दिया गया था। 

सैनिक बाहर भेजे जाने से भी डरते थे क्योंकि उनका मानना था कि समुद्र पार करने से धर्म नष्ट होता है।

 कैनिंग ने 1856 में सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम पारित किया

जिसके अनुसार सैनिक को लडने के लिए कहीं भी भेजा जा सकता था ।

ध्यान से देखा जाए तो ये तमाम कारण 1857 की क्रांति के लिए कोई छोटे कारण नहीं थे।

 इतिहास कार ताराचंद के अनुसार जब भारतीयों के अहम को चोट लगी,,

बादशाह का अपमान हुआ,

अमीर उमरा को प्रभाव से वंचित किया गया तो लोगों में विद्रोह पैदा हो गया।

इस प्रकार 1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि बनती चली गई। 

1857 की क्रांति के पहले भी विद्रोह हुए थे 

🔴अंगरेजी सत्ता के खिलाफ पहला विद्रोह 1724 में बंगाल सेना ने किया था ।

🔴1806 में वेल्लोर में मद्रास सेना ने पगड़ी पहनने,

दाढी बनवाने व तिलक न लगाने के आदेश के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था।

🔴1824 मे बैरकपुर छावनी में भत्ता न मिलने के कारण विद्रोह हुआ।

🔴1844 में 34 वीं लाइट इनफेंटरी ने विद्रोह किया।

🔴1852 में 38 वीं लाइट इंफैंटरी ने विद्रोह किया।

🔴1849में22वीं इंफैंटरी ने विद्रोह किया।

22जनवरी 1857 को बैरकपुर छावनी में कारतूसों के प्रयोग के कारण सैनिक विद्रोह हो गया।

सैनिकों ने छावनी में आग लगा दी ।

बंगाल में इससे भी पहले 19 वीं बटालियन ने

चर्बी वाले कारतूस प्रयोग करने से इन्कार कर दिया था।

फलस्वरूप इस बिलियन को भंग कर दिया गया था।

1856 में सरकार ने पुरानी बंदूक ब्राउनवैस की जगह

एन फील्ड राइफलों के प्रयोग का निर्णय किया था।

इसी में चर्बी लगे कारतूसों का प्रयोग किया जाता था।

कारतूसों को बंदूक से खींचने के लिए दांतों का प्रयोग करना पड़ता था ।

नई राइफल का प्रशिक्षण दमदम, अम्बाला, स्यालकोट में दिया जाना था ।

इन्हीं सब असंतोष के चलते 1857 की क्रांति के ठीक पहले

 

29 मार्च 1857 को 34 वीं बटालियन बैरकपुर के जाबांज सिपाही मंगल पांडे ने

परेड के समय सार्जेंट मेजर ह्यूजसन की गोली मारकर

और लेफ्टिनेंट वो की चाकू मारकर हत्या कर दी थी।

मंगल पांडे को गिरफ्तार करके 8 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी गई थी।

याद रहे मंगल पांडे ने गिरफ्तार होने से पहले खुद

को गोली मारकर खत्म करने का प्रयास किया था।

इस घटना के बाद 34 वीं बटालियन को भंग कर दिया गया था ।

और फिर हो गई क्रांति की शुरुआत 

इस घटना के बाद दानापुर, इलाहाबाद  आगरा, अम्बाला में सैनिकों ने विद्रोह कर दिया।

इसी बीच नाना साहेब जिन्हें अंग्रेजो ने निर्वासित करके बिठूर में बैठा दिया था।

उन नाना साहेब ने तीर्थ यात्रा के रूप में कई जगहों का दौरा करके विद्रोह की योजना बनाई।

विद्रह की तारीख 31 मई 1857 निर्धारित की गई थी

लेकिन क्रांति की पहली चिनगारी 10 मई  1857 को ही मेरठ में ही फूट पड़ी ।

यहां 20 वीं तथा 11 वीं बटालियन ने विद्रोह किया था।

10 मई को 11वीं बटालियन के कर्नल फीनिस की

20 वीं बटालियन के एक सिपाही ने गोली मारकर हत्या कर दी थी

और विद्रोह शुरू कर दिया था।

सभी सिपाही यहां से दिल्ली की ओर कूच कर गए और 11 मई को सुबह दिल्ली पहुंच गए।

 दिल्ली में सिपाहियों को रोकने के लिए 54 वीं बटालियन को लगाया गया

लेकिन इस बटालियन ने भी विद्रोह कर दिया।

विद्रोही सिपाहियों ने दिल्ली में बहुत से अंग्रेज अधिकारियो को मार डाला।

विद्रोहियों ने बहादुर शाह जफर से विद्रोह का नेतृत्व करने की प्रार्थना की।

80 वर्षीय बहादुर शाह जफर ने अंतत: 1 857 की क्रांति का नायक बनना स्वीकार कर लिया । 

क्रांति का प्रसार 

1857 की क्रांति का प्रसार क्षेत्र काफी व्यापक था।

शीघ्र ही यह क्रांति उत्तरी भारत और मध्य भारत में फैल गई।

इसका प्रसार बिहार तक था ।

याद रखने वाली बात यह है कि दक्षिण भारत में इस क्रांति का प्रसार नहीं हुआ।

इलाहाबाद कानपुर बरेली फर्रुखाबाद अलीगढ़ झांसी शाहजहां पुर बदायूं मथुरा आगरा पूर्णिया छपरा आरा पटना आदि विद्रोह के केन्द्र थे। 

पंजाब 

पंजाब की फिरोजपुर छावनी में 13 मई को 45वीं और 57 वीं बटालियन ने विद्रोह कर दिया।

लेकिन पंजाब में विद्रोह व्यापक नहीं हो पाया,

क्यों कि अंग्रेजों ने परेड के बहाने कई बटालियन को तोपों से घेरकर निशश्त्र कर दिया था ।

 पटियाला, नाभा, जिन्द के शासकों ने 1857 की क्रांति में गद्दारी की थी । 

पश्चिमी यूपी, राजस्थान में क्रांति 

20 मई को अलीगढ़ की 9 वीं बटालियन ने विद्रोह किया   

23 मई को इटावा मैनपुरी बुलंदशहर  में विद्रोह फैल गया ।28 मई 1857 को 15 वीं बटालियन ने विदोह कर दिया 

रूहेल खंड में बख्त खां विद्रोह का नेतृत्व कर रहे थे। 31 मई को बनारस मे विद्रह हुहुआ।

3 जून को आजमगढ़ में विद्रोह हुआ ।

6 जून को इलाहाबाद में 6वीं बटालियन ने विद्रोह कर दिया। इलाहाबाद में 8 अंग्रेज अफसर मारे गए।

यहां मौलवी लियाकत अली विद्रोह का नेतृत्व कर रहे थे।

इलाहाबाद में इलाहाबाद के किले की रक्षा के लिए 11जून को जनरल नील सेना के साथ किले में प्रवेश किया।

18 जून को इलाहाबाद में अंग्रजों का पुन:कब्जा हो गया। 

कानपुर बुंदेलखंड लखनऊ बिहार 

कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व नाना साहब कर रहे थे। कानपुर इलाहाबाद के बीच

फतेहपुर में विद्रोह का नेतृत्व अजीमुल्ला कर रहे थे।

कानपुर में नाना साहब को राजा तथा टीका सिंह को सेनापति चुना गया। यहां अंग्रेज कमांडर ह्वीलर था। 

कानपुर में एक नर्तकी यानी नाचने वाली अजीजन भी सैनिकों के भेष में सिपाहियों के साथ मौजूद थी।

नाना साहब ने कानपुर से अंगेजों को भगाने के लिए 40 नावों की व्यवस्था की थी।

जैसे ही अंग्रेज नावों पर सवार होकर बीच गंगा में पहुंचे

नाना साहब के इशारे से विद्रही उउन पर टूट पड़े । सारे अंग्रेज मार दिए गए। 

🔴4जून 1857 को झांसी में विद्रह  हुआ। यहां का नेतृत्व काले खां कर रहे थे।

बाद में रानी लक्ष्मी बाई ने नेतृत्व किया था 

🔴लखनऊ में 24 अप्रैल 1857 को एक बार मौलवी अहमदशाह के नेतृत्व में विद्रह होहो चुका था।

10 जून तक सारा अवथ अंग्रजों सेसे मुक्त हो गया था।।

सर लारेंस ने बाद में विद्रोहियों को फैजाबाद में परास्त किया था।

🔴वाजिद अली शाह के पुत्र विदरीस कादिर को उसकी मां हजरत महल के संरक्षण में

अवध की गद्दी पर विद्रोहियों ने बिठाया था।

🔴1857 की क्रांति का सबसे लम्बा विद्रोह बिहार में चला था।

पीर अली ने बिहार में शुरुआती नेतृत्व किया।

25 जुलाई 1857 को दानापुर की 7वीं 8वीं 40 वीं बटालियनों ने विद्रोह किया था।

कुंअर जगदीश सिंह ने पीर अली के बाद नेतृत्व संभाला था।

कुंअर सिंह 29 जुलाई को कैप्टन डनबर को खत्म कर दिया था।

26 अप्रैल 1858 को जगदीश सिंह की मौत शरीर में जहर फैलने से हो गई थी।

बाद में इनके भाई ने नेतृत्व संभाला था।

अमर सिंह छापामार विशेषज्ञ थे  इनकी प्रसंसा मार्क्स तथा एंगेल्स ने भी कई थी। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 02082018

 

 

 

 

 

 

 

 

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