क्या भगत सिंह को बचाया जा सकता था?

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क्या भगत सिंह को बचाया जा सकता था? 

क्या भगत सिंह को बचाया जा सकता था?

यह सिर्फ एक सवाल नहीं है ।

तो फिर क्या है?

यह एक तमन्ना है जो आज भी लाखों भारतीय युवाओं के दिलों में एक हिलोर की तरह उठती है,

फिर खामोशी में यह सोच कर शांत हो जाती है कि काश,मैं भी तब होता ।

क्या भगत सिंह को बचाया जा सकता था ?सचमुच यह इतिहास का  एक ऐसा सवाल है जिसे आज तक करोड़ों बार दोहराया तो गया है, लेकिन जवाब नहीं मिला ।

क्या कहते हैं खास लोग 

इतिहास कारों के बीच आज भी इस बात को लेकर विवाद है कि क्या भगत सिंह को बचाया जा सकता था?

गांधी जी ने उन्हें फांसी मे चढने से बचाने की कोशिश क्यों नहीं की?

क्या वाकई बापू और अन्य बड़े नेता भगत सिंह के इंकलाबी तेवर और लोकप्रियता से डरे हुए थे?

सच कहें तो शहीद ए आजम की मौत एक नहीं सैकड़ों इसी तरह के जरूरी सवाल छोड़ गई थी ,

जिनका माकूल हल आज तक नहीं निकल सका ।

इतिहास में भगत सिंह 

क्या भगत सिंह को बचाया जा सकता था?

आइए इस सवाल के पहले की कुछ जरूरी बातें जान लें ।

लाहौर षड्यंत्र केस में 23 मार्च 1931 को जब  23 वर्षीय भगत सिंह को राजगुरु, सुखदेव के साथ फांसी पर चढ़ाया गया तो इस  अत्याचार की गूंज पूरी दुनिया ने सुनी थी।

ब्रिटिश हुकूमत के इस कुकृत्य की जहां तत्कालीन भारतीय नेताओं ने जमकर आलोचना की थी ,

वहीं तत्कालीन ब्रिटिश अखबारों ने भी इसे सुर्खियों में छापा था ।

जरा गौर करें श्री मान 

फांसी वास्तव में 24 तारीख को होनी थी ।लेकिन जनता कहीं विद्रोह न कर दे ,

इस डर के चलते विश्व शक्ति ब्रिटिश हुकूमत ने ,

भगत सिंह तथा उनके दो साथियों को चुपके-चुपके रात के अंधेरे में फांसी दी थी ।

इतिहासकार बिपिन चंद्र द्वारा लिखी गई भगत सिंह की जीवनी ,

“मैं नास्तिक क्यों हूं “

में इस घटना के बाद भारतीय नेताओं द्वारा की गई त्वरित टिप्पणियां सिलसिलेवार ढंग से दी गई हैं ।

इन्हें आप भी पढि़ए और खुद इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश करिए कि

क्या भगत सिंह को बचाया जा सकता था? 

सुभाष चंद्र बोस 

यह काफी दुखद और आश्चर्यजनक घटना है कि

भगत सिंह और उनके साथियों को समय से एक दिन पूर्व ही फांसी दे दी गई ।

24 मार्च को कलकत्ता से कराची जाते हुए रास्ते में हमें यह दुखद  समाचार मिला ।

भगत सिंह युवाओं में नई जागरूकता का प्रतीक बन गया है ।

महात्मा गांधी 

 

मैनें भगत सिंह को कई बार लाहौर में एक विद्यार्थी के रूप में देखा है ।

मैं उसकी विशेषताओं को शब्दों में बयां नहीं कर सकता।

उसकी देश भक्ति और भारत के लिए उसका अगाध प्रेम अतुलनीय है,

लेकिन इस युवक ने अपने असाधारण साहस का दुरुपयोग किया है ।

मैं भगत सिंह और उसके साथी देश भक्तों को पूरा सम्मान देता हूं ।

साथ ही देश के युवाओं को आगाह करता हूं कि वे उसके मार्ग पर न चलें ।

 

जवाहर लाल नेहरू 

हम सबके लाडले भगत सिंह को नहीं बचा सके ।उसका साहस और बलिदान भारत के युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है ।

सरदार पटेल 

अंग्रेजी कानून के अनुसार भगत सिंह को सानडर्स हत्याकांड में दोषी नहीं ठहराया जा सकता था ।फिर भी उसे फांसी दे दी गई ।

डीबीरंगा चोरियार

भगत सिंह ऐसे किसी अपराध का दोषी नहीं था जिसके लिए उसे फांसी दे दी जाती ।हम इस घटना की कड़ी निंदा करते हैं ।

अंगरेजी अखबार 

द पीपुल

भगत सिंह एक किवदंती बन गया है ।देश के सबसे अच्छे फूल के चले जाने से हर कोई दुखी है ।

हालांकि भगत सिंह नहीं रहा लेकिन “क्रांति अमर रहे “और भगत सिंह अमर रहें जैसे नारे अब भी हर कहीं सुनाई देते हैं ।

उर्दू अखबार 

रियायत

पूरे देश के दिल में हमेशा भगत सिंह की मौत का दर्द रहेगा ।

आनंद बाजार पत्रिका 

राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह की मौत से पूरे देश पर दुख का काला साया छा गया है ।

पंजाब केसरी 

जिस व्यक्ति ने वायसराय को इन नौजवानों को फांसी पर लटकाने की सलाह दी है वह देश का गद्दार और शैतान था ।

निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि

“क्या भगत सिंह को बचाया जा सकता था ?”

यह सिर्फ सवाल नही है बल्कि भारत के ह्दय की तमन्ना और कल्पना थी ।

जिसका जवाब किसी के भी कोई शब्द नही केवल दिल ही दे सकते हैं ।

धन्यवाद KPSINGH06032018

 

 

 

 

 

 

 

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