टीपू सुलतान : नायक या खलनायक ?

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टीपू सुल्तान :नायक या खलनायक? 

टीपू के रूप में 

टीपू सुलतान :नायक या खलनायक ?अगर आप

इस सच्चाई को जानना है तो,पहले टीपू सुल्तान के बारे में कुछ और जानना होगा।

भारतीय इतिहास की वह  बेहद चर्चित हस्ती है,

जिसके बगैर भारतीय इतिहास को पूरी तरह से

नहीं  समझा जा सकता है।

इतिहासकारों का मानना है कि टीपू के पिता ने 

टीपू को 15 साल की उम्र में ही युद्ध संचालित

करने के लिए युद्ध मैदान में ले जाने लगे थे।

टीपू की निर्भीकता के लिए उसे शेरे मैसूर नाम भी मिला था।

सुल्तान के रूप में 

टीपू कुछ भी हो अपने पिता की मौत के बाद मैसूर

की गद्दी पर बैठते ही,

अपने राज्य को मुस्लिम राज्य घोषित कर दिया था।

इतना ही नहीं  यह संकल्प भी लिया था कि वह

राज्य के प्रत्येक नागरिक को मुसलमान बना देगा।

अपनी इस बात को पूरा करने के लिए इसने राज्य

के एक करोड़ हिन्दुओं को मुस्लिम बनाया था ।

लेकिन जब इसकी मौत हुई तो वे  सभी लोग फिर

से हिन्दू बन गए थे।  

टीपू अपने हाथ की उंगली में राम नाम लिखित

अंगूठी पहनता था।

कुल मिला कर टीपू नायक या खलनायक यह तय

करना मेरा काम नहीं ,

बल्कि यह काम इतिहास के तथ्यों का है ।

टीपू सुल्तान 1782 से 1799 तक 

टीपू के विचार 

टीपू सुल्तान अपने पिता की मौत के बाद 1782 में

मैसूर की गद्दी पर बैठा था।

इतिहास कारों के अनुसार यह अपने पिता के

समान ही राजनीतिक दूर दर्शी था।

टीपू सुल्तान एक पढा लिखा योग्य शासक था।

इसे अरबी, फारसी, उर्दू, एवं कन्नड़ भाषाओं का ज्ञान था।

इसने अपने नवीन प्रयोगों के अंतर्गत नई मुद्रा, नई

माप तौल की इकाई और नवीन संवत को चलाया था। 

चारित्रिक विशेषताएं 

टीपू सुल्तान के चरित्र को लेकर एक धारणा है कि

उसका चरित्र बेहद जटिल था।

इतिहास जानने वाले बताते हैं कि वह नए विचारों को ढूंढ कर लाने वाला था।

समय के साथ अपने को बदलने वाला था टीपू।

उसकी इच्छा थी कि वह एक नया कैलेंडर चलाए।

साथ ही साथ वह सिक्का ढलाई की नई प्रणाली

भी काम में लाना चाहता था।

इतना ही नहीं वह नाप तौल के नए पैमाने को भी

अपनाने की इच्छा रखता था।

धार्मिक प्रवृत्ति 

श्रंगेरी पत्रों से कुछ साल पहले पता चला है कि,

जब 1719 में मराठा आक्रमण से श्रंगेरी मंदिर का कुछ हिस्सा टूट गया था।

तब श्रंगेरी मंदिर के मुख्य पुजारी के अनुरोध पर ही

 टीपू ने मंदिर की मरम्मत तथा शारदा देवी की मूर्ति

की स्थापना के लिए धन दिया था।

टीपू सुल्तान ने श्री रंग पटटम के दुर्ग में स्थित श्री

रंग नाथ नर सिंह की पूजा में कभी हस्तक्षेप नहीं किया 

क्रांति के प्रति 

टीपू सुल्तान ने फ्रांसीसी क्रांति में गहरी दिलचस्पी ली थी।

टीपू सुल्तान ने श्री रंग पटटम में एक स्वतंत्रता वृक्ष

लगाया और जैकोबिन क्लब का सदस्य बन गया

था।

टीपू ने जागीर देने की प्रथा को खत्म कर दिया था।

टीपू ने राजकीय आय बढ़ाने के लिए भी प्रयास किया था।

टीपू एक तिहाई हिस्सा की सीमा तक भू राजस्व

वसूली करता था। 

टीपू की प्रिय लाइनें 

टीपू को जो लाइनें सबसे प्रिय थीं वह इस प्रकार हैं।

“एक शेर की तरह एक दिन जीना बेहतर है बजाय

भेङ की तरह लंबी अवधि  तक जीने से। 

धन्यवाद

KPSINGH

12052018

 

 

 

 

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