भारत के महान व्यक्तिव

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भारत के महान     व्यक्तिव- 1

भारत के महान व्यक्तिव – 1नामक इस पोस्ट का उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है दोस्तों।

मैं आपको भारत के महान व्यक्तिव नामक श्रृंखला में हर दिन

भारत के उन महान सपूतों के बारे में बताना चाहता हूं

जिनके बारे मे हमारी नई पीढ़ी या तो जानती ही नहीं या फिर बेहद कम जानती है ।

दोस्तों क्या कभी आपने सोचा है कि हमें इतिहास क्यों पढाय जाजाता है?

अगर सोचा है तो जानते ही होंगे और यदि कभी

भी इसके बारे में नहीं सोचा तो चलिए हम बताते हैं।

दोस्तों इतिहास के बड़े बड़े विद्वान चाहे जो कुछ बताएँ

लेकिन इसका आम आदमी की भाषा में कारण यह है कि

हमें इतिहास से सीख और समझ का सहारा मिलता है  ।

इतिहास महज तारीखों का संकलन नहीं है

बल्कि इतिहास हमें यह बताता है कि हमें किस परिस्थिति में

कौन आ व्यवहार करना चाहिए ताकि हमारा

वर्तमान भूतकाल की सीख रूपी  प्रकाश से प्रकाशित हो जाए।

दोस्तों जरा सोचिए हमारे पूर्वज हमारा इतिहास हैं।

इस लिए जो सीख और समझ हमें इतिहास से मिलती है

वही सीख और समझ हमें हमारे महान व्यक्तियों से मिलती है ।

इसीलिए मैं आपके लिए यह श्रृंखला लेकर हाजिर हूं।

प्रस्तुत है आज इस श्रृंखला का पहला भाग। 

पार्श्वनाथ 

भारतीय समाज के कुछ भागों में यह गलत धारणा फैली हुई है

कि भगवान् महावीर स्वामी जैन धर्म के संस्थापक हैं।

जबकि वह जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में अंतिम तीर्थंकर हैं 

जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव हैं जिन्हें आदिनाथ भी कहा जाता है।

स्वामी पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23 वें तीर्थंकर हैं।

स्वामी महावीर की ही भांति पार्श्वनाथ की ऐतिहासिकता असंदिग्ध है ।

स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म बनारस के एक राज परिवार में हुआ था ।

इनके पिता का नाम राजा अश्वसेन था  माता का नाम रानी वामा था।

राजकुमार पार्श्वनाथ अपने मधुर और परोपकारी

स्वभाव के कारण सामान्य जनमानस में बेहद ल थे।

राजा नरवर्मन की बेटी राजकुमारी प्रभावती से उनका विवाह हुआ था ।

30 वर्ष की आयु में पार्शश्वना ने सांसारिक मोहमाया त्याग कर संन्यास ग्रहण कर लिया था।

कहते हैं कि 83 दिन की घोर तपस्या के बाद इन्हें केवलम महा ज्ञान प्राप्त हुआ था ।

प्रोफेसर जैकोबी पार्श्वनाथ को ही जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक मानते हैं ।

प्रोफेसर के अनुसार उन्होंने जैन धर्म के प्रचार प्रसार के लिए

अपना राजसी वैभव त्याग दिया था।

उनक 8 गण तथा 8 गणधर थे।

उन्होंने 100 वर्ष की आयु में सम्मेत शिखर में प्राण त्याग दिया था।

सम्मेत पर्वत आजकल झारखंड में गिरिडीह के पास है।

स्वामी पार्श्वनाथ का समय 8 वीं शताब्दी ईषा पूर्व माना जाता है।

🔴पार्शश्वना ने 4 व्रतों के पालन का निर्देश दिया जो इस प्रकार हैं

:अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह।

भगवान् महावीर स्वामी ने पार्श्वनाथ की इन्हीं चार प्रमुख शिक्षाओं में

पांचवी शिक्षा  ब्रह्मचर्य जोड़ी थी।

स्वामी पार्श्वनाथ का पवित्र चिन्ह सर्प है।

जबकि महावीर स्वामी का चिन्ह सिंह है। 

जैन धर्म के 24   तीर्थंकर 

🔴ऋषभदेव🔴अजितनाथ🔴संभवनाथ

🔴अभिनंदन नाथ🔴सुमित नाथ🔴पदमप्रभ

🔴सुपारश्व🔴चंद्र प्रभु🔴सुविधि नाथ

🔴शीतल नाथ🔴श्रेयांस🔴वासुपूज्य

🔴विमल नाथ🔴अनंत नाथ🔴धर्म नाथ

🔴शांति नाथ🔴कुंथ नाथ🔴अर्ह नाथ

🔴मल्लि नाथ🔴मुनिसुवरत नाथ🔴नेमि नाथ

🔴अरिष्ट नेमि🔴पार्श्वनाथ🔴महावीर स्वामी। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 29072018

 

 

 

1 COMMENT

  1. आपने जो यह जैन दर्शन के श्री पार्शनाथ प्रभु के बारें में बताया है इसमें कुछ बातें सही नहीं हैं।
    गलती आपकी नहीं है ,क्योंकि आपने तो वो ही बताया जो इतिहासकारों ने इतिहास में दर्ज किया , जैन दर्शन के बारे में इतिहास में बहुत सी बातें सही नहीं कही गयी हैं ।
    जैन दर्शन के बारे में लोग बहुत कम जानते हैं और जितना जानते हैं वो बहुत स्थूलरूप से ही जानते हैं सूक्ष्म रूप से नहीं , वास्तविकता नहीं, सार नहीं जानते हैं।
    ये सब मैं ग्रन्थों को सही प्रकार से पढ़ने और समझने के बाद ही कह रही हूँ।

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