भारत में आदिवासी विद्रोह

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भारत में आदिवासी विद्रोह 

भारत में आदिवासी विद्रोह कहें या

भारत में अथ श्री आदिवासी विद्रोह कथा।

बात कुछ अलग अलग हैं लेकिन मतलब केवल एक ही है,

अर्थात हम चाहे जितने भी प्रकार के आदिवासी विद्रोह की चर्चा करें

सभी का मकसद एक ही था।

और वह था 

किसी भी कीमत में भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से मुक्ति दिलाना।

पूरा देश ही नहीं यह बात पूरा विश्व जानता है कि

भारत के आजादी के आंदोलन में भले ही सभ्य समाज अपने तन मन से जुटा हो

जंगलों और अविकसित जगहों में रहने वाले कुछ कम सभ्य लोग भी

अपने तन मन धन और आन बान शान से भारत माता की सेवा में तत्पर थे।

इसे ही हम आप सब भारत में आदिवासी विद्रोह कहते हैं। 

आदिवासी विद्रोह

अंग्रेज़ी साम्राज्यवादी नीतियों के शोषण से कसमसा कर जब

आदिवासियों ने भी तीव्र और हिंसक प्रतिरोध कर दिया अंग्रेजों के खिलाफ

तभी से भारत में अथ श्री आदिवासी विद्रोह कथा का प्रारंभ होता है।

अब तक तमाम प्रकार के शोधों से यह स्पष्ट हो चुका है कि

आदिवासियों के अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ हुुए विरोध

कहीं ज्यादा हिंसकऔर संख्या में अधिक थे।

आदिवासी समुदाय आमतौर पर सामान्य नागरिक

जीवन से अलग रहते थे।

इनकी अपनी जीवनशैली व जीने के तौर-तरीके भी अलग थे।

आदिवासी समुदाय को अपने आसपास किसी बाहरी

नागरिक का हस्तक्षेप

कतई स्वीकार नहीं था।

लेकिन चूंकि  ब्रिटिश नीतियां हस्तक्षेप से ही शुरू होती थीं

इसलिए ब्रिटिश उपनिवेश की स्थापना के बाद जब अंग्रेजों ने

आदिवासियों के क्षेत्र का अतिक्रमण करना प्रारंभ किया

तो इसके खिलाफ आदिवासियों ने सशस्त्र विद्रोह कर दिया । 

आदिवासी विद्रोह के कारण 

ब्रिटिश साम्राज्य वादी नीतियों के परिणामस्वरूप

जमींदारों,

साहूकारों, ठेकेदारों तथा बिचौलियों का एक भयंकर

वर्ग बन चुका था ।

सच बात तो यह है कि जब इस वर्ग ने अंग्रेजी इशारे के कारण

आदिवासी इलाकों  में अपनी घुसपैठ शुरू की और

उनके आंतरिक जीवन में हस्तक्षेप किया

तभी आदिवासियों ने विद्रोह शुरू कर दिया था।

राजस्व की प्राप्ति तथा प्राकृतिक संसाधनों के दोहन

के कारण ही

आदिवासियों के जन जीवन में दखल दिया गया था।

ब्रिटिश उपनिवेशवादी नीति ने निजी स्वामित्व की

अवधारणा का विकास किया,

, जिसने आदिवासियों की सामूहिक स्वामित्व की

अवधारणा को क्षति पहुंचाई। 

यह आदिवासियों की भावनात्मक क्षति थी परिणाम

स्वरूप आदिवासियों ने विद्रोह किया था ।

आदिवासी इलाकों में ईसाई मिशनरियों की घुसपैठ भी

आदिवासी विद्रोह का एक कारण थी।

आदिवासियों ने मिशनरी हलचल को अपने धर्म और

समाज के लिए खतरनाक माना था।

एक दूसरा कारण यह था कि ईशाई मिशनरियों की

शिक्षा से शिक्षित हुए आदिवासियों में आई चेतना भी

विद्रोह का कारण थी ।

ब्रिटिश राज में आदिवासियों से बेगार ली जाती थी।

साथ ही उनकी परंपरागत झूम खेती को प्रतिबंधित

करना भी इनके विद्रोह का एक कारण था ।

आदिवासी विद्रोहों का स्वरूप 

आदिवासियों के विद्रोह जातीय आधार पर संगठित विद्रोह थे ।

इनका आधार वर्ग कतई नहीं था।

संथाल, कोल, मुंडा आदि जाति गौरव ही अंग्रेजी सत्ता से लोहा ले रहे थे।

आदिवासियों ने बाहरी लोगों का विरोध अवश्य किया लेकिन उन्होंने

केवल शोषक वर्ग का ही विरोध किया था।

जितने भी निचले तबके के गरीब लोग थे जैसे धोबी, बढी, नाई इत्यादि।

आदिवासियों के विद्रोह की सबसे बड़ी खासियत यह

थी कि इनका विद्रह संगठित  विद्रोह था । 

कुछ प्रमुख आदिवासी विद्रोह 

 

पहाड़िया विद्रोह 

पहाड़िया विद्रोह को ही तिलका माझी विद्रोह
कहते हैं ।
इसका समय 1788से1790माना जाता है ।

 

पहाड़िया लोग बंगाल के वीर भूमि जिले के
निवासी थे।
इनके विद्रोह का कारण इनकी जमीन छीन कर
जमींदारों को दिया जाना था ।

इन्होंने अपने विद्रोह स्वरूप अंग्रेज अधिकारीयों की

कोठियों को

तथा जमींदारों की सम्पत्ति को निशाना बनाया था।

तीर कमान तथा बंदूकें भी इनके युद्ध में शामिल थे।

इनके विद्रोह को 1790 में दबा दिया गया था । 

चुआड़ विद्रोह 

यह विद्रोह भी बंगाल के बांकुड़ा क्षेत्र में फैला था।

चुआड़ आदिवासी भी झूम खेती करते थे

साथ ही साथ स्थानीय जमींदारों के यहां सिपाही का काम करते थे।

बदल में इन्हें वेतन की जगह जमीन दी जाती थी।

इस जमीन को माइकान जमीन कहा जाता था।

जब ब्रिटिश राज में इस जमीन पर कब्जा शुरू हुआ और इस जमीन को

नए जमींदारों में बाटा जाने लगा तो पुराने वंचित जमींदार तथा

चुआड़ लोगों ने विद्रोह कर दिया।

विद्रोह का आरंभ मेदिनी पुर जिले में रायपुर परगने के

पुराने जमींदार दुर्जन सिंह ने किया।

जे सी प्राइस की किताब चुआड़ विद्रोह इन्हीं पर लिखी गई है  

चेर विद्रोह 

चेर मूलतः बिहार में पलामू क्षेत्र में रहने वाले

आदिवासी थे।

इस क्षेत्र में कंपनी ने पहले ही कब्जा कर लिया था।

यहां अंग्रेजों ने राजाओं की नियुक्ति में हस्तक्षेप किया।

परिणाम यह हुआ कि कंपनी और राजाओं ने

जमींदारों की जमीन छीन लिया।

फलस्वरूप यहां 1800 में भूषण सिंह ने विद्रोह किया

जिसका अंतत:ब्रिटिश सेना द्वारा दमन किया गया। 

भील विद्रोह 1818/

भील दक्षिणी पश्चिमी क्षेत्र के आदिवासी थे।

भील विद्रोह खान देश के क्षेत्र में फैला था।

भीलों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था ।

इनके साथ पेशवा के मंत्री त्रियंबक भी थे।

भील विद्रोह 1822 में हिरिया के नेतृत्व में फैला था।

1824 मे त्रियंबक के भतीजे दंगलिया ने भीलों को

सतारा के राजा की वापसी

तथा पुनः मराठा सत्ता स्थापित करने के नाम पर

बांगलाना क्षेत्र में विद्रोह किया था।

अंग्रेज़ी सेना के सेनापति आउट्रम ने भीलों को सेना में भर्ती करके

अंत में भीलों का ही दमन करवाया था। 

हो विद्रोह 1820/21 

बंगाल के पोराहट क्षेत्र के आदिवासियों ने 1820
में यह विद्रोह किया था।
क्योंकि यहां के राजा को 1820 में अंग्रजों ने
अअपने संरक्षण में ले लिया था।
यहां के राजा जगन्नाथ थे।
राजा ने अंग्रेजी सेना की सहायता से हो जनजाति का दमन किया था। 

खासी विद्रोह 1829/33

गारो, खासी और जयंतिया की पहाड़ियों के बीच के क्षेत्र में

निवास करने वाली एक लडाकू जनजाति थी खासी।

खासी विद्रोह सड़क बनाने के विवाद की वजह से हुआ था।

1829 में नकलों में कई अंग्रेज अफसरों को खासियों ने मार डाला था ।

इस विद्रोह का नेता तीरथ सिंह था।

बार मानिक तथा मुकुंद सिंह तीरथ के सहयोगी थे। 

सिंगफो विद्रोह 1830/31

सिंगफो असम में सीमावर्ती क्षेत्र में बसी पहाड़ी जनजाति है।

1825 में अंग्रजों ने इन्हें परास्त करके अपने अधीन कर लिया था।

 रनुआ गोंहाई के नेतृत्व में यह विद्रोह हुआ था।

यह आंदोलन असम से अंग्रजों को भगाने का अंतिम बड़ा प्रयास था। 

अका विद्रोह1829/3

यह असम की घाटियों के बीच रहने वाली प्रजाति थी।

अकाओं के नेता तागी राजा के नेतृत्व में यह विद्रोह हुआ था । 

कोल विद्रोह 1831/32

यह विद्रोह 1831/32 में छोटानागपुर में हुआ था।

यह जमींदारों के खिलाफ एक भयंकर लडाई थी।

कोल परम्परानुसार इनके 7से 12 गांवो की एक पीर होती थी, 

जिस पर एक प्रधान या मानकी होता था जोकि क्षेत्र का लगान सरदारों को देता था।

मानकियों को पद से हटाने व महिलाओं से बलात्कार के कारण यह विद्रोह हुआ था।

सुर्गा तथा सिगराय ने कोल विद्रोह का नेतृत्व किया था। 

गोंड विद्रोह 1833

गोंड उड़ीसा के निवासी थे।

गोंड विद्रोह संभल पुर राज्य की रानी मोहन कुमारी के

उच्च जातियों के हिंदुओं के प्रति भेदभाव के कारण फैला था।

इन तमाम आदिवासी विद्रोहों के अलावा भी कुछ बेहद महत्वपूर्ण आदिवासी विद्रोह हुए हैं,

जिनका वर्णन इस प्रकार है

🔴कोलियों का विद्रोह 1839/50 के बीच।

यह कच्छ सीमा से पश्चिमी घाट तक फैली

आदिवासी जाति थी।

भाऊ सरे, चिमना जी जादव  नाना दरबारे इनके

नेता थे।

रघु भंगरिया  बापू भंगरिया भी नेता थे।

🔴खोंड विद्रोह 1846 में हुआ था।

🔴संथाल विद्रोह 1855/56 में हुआ था।

🔴जयंतिया विद्रह 1860/63 में हुआ था।

🔴कूकी और रियांग विद्रोह 1860 /90 में हुआ था ।

🔴रम्पा विद्रह 1879/80 में हुआ था।

🔴बिरसा मुंडा विद्रोह 1899/1900 में हुआ था।

🔴कुडप्पा वन सत्याग्रह 1913 में हुआ था।

🔴1910 में जगदलपुर का विद्रोह हुआ था।

🔴खोंड विद्रोह 1914 में उडीसा के दस पल्ला क्षेत्र में फैला था।

🔴जात्रा भगत विद्रह 1914 में हुआ था।

🔴अललूरी सीता राम राजू का विद्रोह 1922 से 1924 के बीच चला था।

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 13082018

 

 

 

 

 

 

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