डॉक्टर भीम राव राम जी के बहाने

5
79

 

डॉक्टर भीम राव राम जी अम्बेडकर के बहाने 

डॉक्टर भीम राव राम जी अम्बेडकर के बहाने ,

आज मैं आपको यह बताने वाला हूं कि कैसे एक काबिल और महान व्यक्ति को ,

पहले अपने जीवन काल में ही चालाक लोगों की चालाकी का ,शिकार होना पड़ता है ,

और बाद में तथाकथित अपने लोगों की राजनीतिक,

महत्वाकांक्षा का मरीज बनना पड़ता है ।

इस प्रसंग में सबसे बड़ी बात यह है कि जिस काल में ,

राम जी अम्बेडकर को

अमानवीय सामाजिक व्यवहार का शिकार होना पड़ा,

उसी काल में राम जी अम्बेडकर को बाबा साहब बनाने वाले भी मौजूद थे ।

लेकिन उनके बाद उनकी झूठी विरासत को संभालने वालों ने ,

ऐसा ताना बाना बुना कि राम जी अम्बेडकर की संपूर्ण सकारात्मकता को ही निगल गए ।

जिसका परिणाम यह हुआ जिस बाबा साहब की गली-गली पूजा होनी चाहिए ,

उसी व्यक्ति की गली-गली बुराई होने लगी ।

जो अम्बेडकर सार्वजनिक प्रतिष्ठा के पात्र थे उन्हें सार्वजनिक

तिरस्कार तक का शिकार बनना पड़ा ।

स्वीकार अस्वीकार के बीच अम्बेडकर

डॉक्टर भीम राव राम जी अम्बेडकर की प्रतिष्ठा ,

इतनी कालजयी और ऊर्जावान थी कि यदि ,

आजादी के बाद उसकी पहचान की जाती तो भारत का सार्वभौमिक ,

सचमुच का कल्याण हो जाता लेकिन अफसोस कि ऐसा नहीं हो पाया ।

और जो हुआ है वह है अम्बेडकर का स्वीकार अस्वीकार के बीच त्रिशंकु बन जाना ।

मुझे लगता है आजादी के पहले और आजादी के बाद ,

जिन लोगों की तूती आम जनता के दिल और दिमाग में बोलती थी ।

उन्होंने ही यह चाहा था कि अम्बेडकर के साथ ऐसा हो।

और ताज्जुब यह है कि दलितों में लाखों मसीहा होने के बाद भी,

सचमुच महान व्यक्ति की महानता अब भी प्रश्न चिन्ह से अलग नहीं हो पाई ।

बाबा साहब के अपनों का कमाल 

●बाबा साहब के अपनों का कमाल यह है कि बाबा साहब की तरह ,

सभी प्रसिद्ध तो होना चाहते हैं लेकिन उनकी शिक्षा या उनके कथनों पर अमल नहीं करना चाहते ।

नफरत की राजनीति का बोलबाला है ।

आजादी के बाद जितनी भी सुख सुविधा जाति विशेष को ,

प्राप्त है वह सब कुछ परिवारों तक  ही उपलब्ध हैं ।

यही सच्चाई है ।

खंड खंड बटा समाज इस बात का प्रमाण है कि हम क्रांति तो चाहते हैं ,

लेकिन अपने खोल को छोड़ना नहीं चाहते ।

ऐसा नहीं है कि लोगों को फायदा नहीं हुआ लेकिन यह फायदा कुछ लोगों तक ही सीमित है ।

जगह-जगह मूर्ति स्थापना की  राजनीति की सच्चाई यह है,

कि जो दुराव समाज के ठेकेदार टाइप के लोग दलित वर्ग से रखते हैं ।

वही दुराव दलित वर्ग अपने ही तबके से रखते हैं ।

यह हर बार सिद्ध हुआ है ।।

राजनीतिक सच्चाई यह है कि अम्बेडकर जितना कुछ करके गए हैं ,

उसकी तुलना में कुछ भी ऐसा नहीं हुआ जिसे देखकर कहा जाए,

कि सचमुच अम्बेडकर की सत्ता का सदुपयोग किया गया है ।

अम्बेडकर की लड़ाई कौन लड़ रहा है? 

●बाबा साहब अंतिम समय तक समय और समाज से वंचित वर्ग के लिए लड़ते रहे ।

●लेकिन आज जो बाबा साहब की लड़ाई  के मसीहा है उनसे कोई पूछे कि आपको किसकी चिन्ता है ।

●ध्यान दें इनका उत्तर भले ही कुछ हो पर सच्चाई यही है कि,

जिस व्यवस्था के खिलाफ अम्बेडकर लड़ाई कर रहे थे ।

●आज अम्बेडकर के अनुयायी उसी व्यवस्था को व्यवस्थित कर रहे हैं ।

●खंड खंड बंटा दलित समाज किसका प्रतीक है?

●यह सच्चाई क्या बदलनी नहीं चाहिए कि समाज से अब जातीय श्रेष्ठता गायब होनी चाहिए ।

● इस पावन कार्य में कया अम्बेडकर के उत्तराधिकारी भी शामिल नहीं  होने चाहिए ?

●कोई अन्यथा न ले लेकिन सच्चाई यह है कि अम्बेडकर के प्रयासों के फलस्वरूप ,

जो वंचित वर्ग आज सक्षम है वह भी अपने आसपास ,

वही ऊंची नीची सोच का जाल फैलाए रखना चाहते हैं ।

●अम्बेडकर कहा सपना जाति मुक्त समाज  था।

लेकिन क्या कोई घोर अम्बेडकर वादी यह कहना चाहेगा ,

कि हां उसने जाति मुक्त समाज के लिए खुद अपनी ही जाति का क्रिया कर्म कर दिया है ?

●आज अम्बेडकर के बहाने मैं यही कहना चाहता हूं कि ,

समाज में जो भी लोग जाति के उपासक हैं वह अम्बेडकर के खिलाफ हैं ।।

●नोट करें यह जाति का मतलब सिर्फ उच्च और निम्न जाति से नहीं है ,

बल्कि वंचित वर्ग के ही साए में जीने वाली हजारों जातियों से है ।

 

धन्यवाद

लेखक : के पी सिंह

14042018 

●●●●

 

5 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here