एवरेस्ट :साहस और विश्वास की गाथा

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एवरेस्ट :साहस और विश्वास की गाथा 

एवरेस्ट :साहस और विश्वास की ऐसी गाथा है ,

जो इंसान की न केवल उद्यमिता को प्रमाणित करती है ,

बल्कि इस बात का प्रमाण भी प्रस्तुत करती है कि,

इंसान का साहस एवरेस्ट जैसी फतह से भी कहीं ऊंचा होता है ।

धरती की सुन्दरता और उसकी प्राकृतिक छटा को निहारने की ललक ,

इन्सानी सभ्यता के साथ ही जन्म ले चुकी थी ।

एवरेस्ट फतह करना इंसान के जज्बे और जोश के साथ ही साथ,

साहस और विश्वास की अद्भुत गाथा भी है ।

तो आइए आज इंसान की साहस और विश्वास की गाथा को ,

जानने का प्रयास करते हैं एवरेस्ट के बहाने,

कुछ इस तरह :

एवरेस्ट फतह का विचार 

साहस और विश्वास की गाथा एवरेस्ट के संबंध में एक वाक्या बेहद महत्वपूर्ण है ।

बात 1953  की है ।

महारानी एलिजाबेथ द्वितीय की ताजपोशी की तैयारी चल रही थी ।

अंग्रेज चाहते थे कि उनका कोई नागरिक या फिर कम से कम ,

राष्ट्रमंडल सदस्य देश से कोई एवरेस्ट फतह करने का कारनामा कर दिखाए ।

समय बेहद तेजी से गुजर रहा था ।

एक साल पहले एवरेस्ट फतह से संबंधित एक घटना सबको परेशान कर रही थी ।

हुआ यह था कि एक साल पहले एक स्विस टीम,

एवरेस्ट फतह के बिल्कुल करीब पहुंच गई थी ।

लेकिन चोटी से एक हजार फीट के पास से पूरी टीम को उतरने पर विवश होना पड़ा था ।

एवरेस्ट फतह की योजना 

साहस और विश्वास का प्रतीक एवरेस्ट लगातार ,

इंसानी साहस और विश्वास की परीक्षा पे परीक्षा ले रही थी,

फिर भी इंसान अभी तक सफल नहीं हुआ था इसे फतह करने में ।

रायल जियो ग्राफिक सोसायटी और ग्रेट ब्रिटेन के अल्पाइन क्लब की ,

संयुक्त हिमालयन समिति के सौजन्य से सन 1953 में एवरेस्ट फतह की योजना बनी ।

इन दोनों संस्थाओं के सौजन्य से अंजाम दिए जाने वाले ,

पर्वतारोही अभियानों का नेतृत्व सर जान हंट करते थे ।

चूंकि न्यूजीलैंड के पर्वतारोही एडमंड हिलेरी 1951 और 1952 में ,

एवरेस्ट की टोह लेने वाले दल में शामिल रह चुके थे ,लिहाजा वे सर जान हंट से भली भांति परिचित थे ।

एवरेस्ट फतह के इस अभियान में हिलेरी के अलावा तेन जिंग नारगे को शामिल किया गया था ।

तेन जिंग नेपाल के स्थानीय पर्वतारोही थे ।

एवरेस्ट फतह का सफल अभियान 

साहस और विश्वास के प्रतीक एवरेस्ट फतह का 1953 का अभियान ,

आधुनिक मानकों की तुलना में काफी बड़ा था ।

400 से अधिक लोगों के दल में 300 से ज्यादा सामान ढोने वाले लोग थे।

एक दर्जन पर्वतारोही और 18 टन खाद्यउपकरण शामिल थे ।

इस दल ने चोटी पर दक्षिण पश्चिम से चढने का विचार किया ।

इसका रास्ता खुमबू ग्लेशियर से होते हुए एवरेस्ट और ल्हातसे के बीच के रिज से निकलता था ।

साउथ कोल के पास हिमालय की एक और चोटी है ।

यह समुद्र तल से 26 हजार फीट ऊंची है ।

इसी रास्ते को ध्यान में रखकर अभियान दल ने मार्च 1953 में बेस कैंप बनाया ।

वह यादगार अभियान 

●बेस कैंप बन जाने के बाद हिलेरी ने खुमबू आइस फाल तक रास्ते का निरीक्षण किया ।

●26 मई को अभियान के दो सदस्य बारडिलन और इवाअंस ने भी अंतिम चढाई का प्रयास किया था ।

●लेकिन इवाअंस की आक्सीजन सप्लाई बंद हो जाने के चलते उन्हें पीछे हटना पड़ा था ।

●28 मई को यह दल यात्रा के नौवें कैंप तक पहुंचा ।

●हिलेरी और तेन जिंग ने 27900 फीट पर तंबू लगाया ।

●जब कि इनकी सहायता में गए लोग वापस लौट गए ।

●हिलेरी और तेन जिंग ने अंतिम चढाई के लिए अगला दिन चुना ।

●इसके लिए उन्होने 14 किलोग्राम वजनी पैक पहनने का निर्णय लिया था ।

●29 मई को हिलेरी और तेन जिंग के सामने अंतिम बाधा 40 फीट थे यानी केवल 12 मीटर ।

●आज इसी अंतिम 12 मीटर को हिलेरी स्टेप कहा जाता है ।

●बाद की चढाई आसान थी ।

●दोनों शिखर पर सुबह 11:30 पर खड़े थे ।

●दोनों ने चोटी पर 15 मिनट बिताया ।दोनो के वापस लौटते वक्त लेवी ने इनका गर्म सूप से स्वागत किया था ।

धन्यवाद

लेखक :के पी सिंह

15032018

 

 

 

 

6 COMMENTS

  1. साहस है किसी भी को लेकर तो उस काम को पूरा किया जा सकता है।

  2. बहुत ही अद्भुत व सुंदर वर्णन किया है। ऐसा लगता है जैसे आंखों देखा हाल लिखा गया हो। धन्यवाद।

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