एक मुहब्बत ऐसी भी

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   एक मुहब्बत ऐसी        भी   

एक मुहब्बत ऐसी भी  होती है यह यहां पर इस लिए नहीं लिखा गया

क्योंकि सच में, पहले कभी ऐसी मुहब्बत या तो देखी नहीं गईं या फिर यह इतनी विरली होती थीं

कि कोई कोई ही इनके बारे में जान पाता था ।

दोस्तों,, मैं आज जिस मुहब्बत के बारे में यहां अपनी इस पोस्ट पर चर्चा करना चाहता हूं

उसके बारे में कुछ भी कहने से पहले क्षमा चाहूंगा यदि किसी को मेरी बात गलत या असंगत लगे।

सच्चाई यह है कि दुनिया में कहीं भी एक ही मिजाज के लोग नहीं पाए जाते

इसलिए मुझे पता है कि आप मुझसे असहमत भी हो सकते हैं।

एक और बात यह भी मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि मेरी इस पोस्ट का मकसद

किसी को नीचा या कमतर दिखाने की कोशिश भी नहीं है ।

मैं यहाँ पर अपना एक समाज शास्त्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहा हूं

जिसका लक्ष्य व्यक्तिगत नहीं है।

यह एक सामाजिक विसंगति है  जिसे रेखांकित करना मेरी ड्यूटी है ।

आखिर यह विसंगति क्यों है? 

वास्तव में यह विसंगति क्या है?

यह मैं आपको बताऊँ इससे पहले मैं आपको दो दृश्य दिखाना चाहता  हूं ।

पहला दृश्य सदर अस्पताल का है इसमे दो लोग एक साथ  एक ही वार्ड में भर्ती हैं।

एक पुरुष है दूसरी स्त्री है।

इससे भी बढकर खास बात यह है कि इनमें एक पत्नी है, एक पति है।

पता चला है कि यह पति पत्नी वाले जोडे ने आपस में मारपीट की है।

दोनों के सिर फटे हैं।

दोनों लहू लुहान से हैं यह निहायत आपसी लड़ाई है ।

काफी कुछ पता करने पर मालूम हुआ कि दोनों अध्यापक हैं प्राथमिक विद्यालय में।

दोनों ड्यूटी साथ ही एक विद्यालय में जाते हैं  दोनों को एक बेटी है।

बेटी एक साल की है। मारपीट का कारण बेटी है।

पत्नी का कहना था कि चूँकि वह भी ड्यूटी जाती है

इसलिए बेटी की जिम्मेदारी पति को भी बांटनी चाहिए।

यही बहस बाद में मारपीट में बदल गई और इसके बाद दोनों अस्पताल पहुंच गए थे।

 

सीन नम्बर दो इस प्रकार है।

जनपद फतेहपुर की कचेहरी प्रांगण में एक जोड़ा अपने अपने परिजनों के साथ आया है।

दोनों खामोश हैं।

पता करने पर ज्ञात हुआ कि दोनों तलाक के पेपर साइन करने के बाद

आज एक दूसरे से अंतिम छुटकारा पाने के लिए कलेक्ट्रेट आए हैं।

यह दोनों अध्यापक हैं।

मजेदार बात यह है कि यह दोनों भी एक ही ब्लाक में नियुक्त हैं।

दोनों का प्रेम और अरेंज मैरिज है।

यानी पहले इन दोनों ने अपना अपना जीवन साथी तय किया फिर इनके घरवालों ने इनकी शादी की थी।

दोनों सीन का निष्कर्ष 

दोनों सीन का निष्कर्ष सामाजिक विसंगति की ओर इशारा कर रहा है ।

इन दोनो सीन के प्रमुख पात्रों की असलियत यह है कि इन दोनों ने

अपने प्रशिक्षण काल में ही सोच विचार कर के एक दूसरे से प्यार किया था शादी के लिए।

जी हां इनके प्यार का उद्देश्य शादी थी।

और इस सादी का उद्देश्य यह था कि जब एक नौकरी की बजाय दो नौकरी होंगी

तो दोनों की जिन्दगी मे ज्यादा खुशहाली आएगी ।

यानी ज्यादा बडी़ सेलरी तो ज्यादा खुशहाल जिंदगी।

आप थ्यान से देखिए इनके बीच पैदा हुआ प्यार प्यार नहीं था।

इसे आप नोटों के लिए किया गया समझौता कह सकते हैं ।

और सच्चाई यह है कि जहां समझौता होता है वहां प्यार कहां से आएगा ।

प्यार बाजार में नहीं मिलता 

आजकल मुहब्बत का एक नया तरीका चल रहा है।

यह नई किस्म की मुहब्बत अचानक नहीं होती और न ही दिल से पैदा होती है।

दरअसल यह नई किस्म की मुहब्बत दिमाग में पैदा होती है जिसका पूरा एक गणित होता है ।

यह नई किस्म की मुहब्बत बहुत सोच समझ कर किसी से प्यार करती है।

जब उसे इस बात का पूरा अंदाजा हो जाता है कि फलां से मुहब्बत करने में

क्या-क्या फायदा हो सकता है।

तभी यह गणित मुहब्बत में बदल जाती है।

मेरे कहने का मतलब यह है कि आजकल जब भी किसी को नौकरी मिलती है

तो वह केवल अपने वेतन के बारे में नहीं सोचता बल्कि वह यह सोचता कि या तो

कोई नौकरीपेशा से उसकी शादी हो या फिर और कहीं से मोटे दहेज का इंतजाम हो जाए ।

इस तरह के जोडे चूंकि मुहब्बत से नहीं गणित से बनते हैं इसलिए जल्द ही बिखर जाते हैं ।

तब सिर्फ यही कहने का मन करता है कि है या तो नोट गिन लो या फिर मुहब्बत कर लो।

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 20082018

 

 

 

 

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