काश! तुम बेवफा होतीं

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काश! तुम बेवफा होतीं

काश  तुम बेवफा होतीं।

ये वही चार शब्द हैं,जो डीएम फतेहपुर उप्र अजय अनुराग के मुंह से,

अनायास ही निकल गए थे, 

 जब  वह आज सालों बाद पहली बार अपनी

सबसे अच्छी दोस्त आस्था रिजवी से बात कर रहे थे।

तो इससे ज्यादा न तो डीएम साहब

कुछ कह पाए थे और न ही इससे ज्यादा आस्था कुछ सुन पाई थी।

दोस्तों,यह कहानी केवल कहानी नहीं है बल्कि हकीकत की वह कहानी है,

जो कहानी होकर भी अक्सर कहानी बनने से वंचित रह जाती है । 

वह मुलाकात, और यूं  बदली जिंदगी 

 

डी एम अजय अनुराग की जिस कहानी से आस्था रिजवी जुड़ी हुई थी,

वह कहानी आज की नहीं थी, बल्कि ये आज से काफी पहले की कहानी है।

इलाहाबाद का इर्विंग क्रिश्चियन कॉलेज किसी जमाने में,

इलाहाबाद का सबसे टाप कालेज हुआ करता था पढाई में।

शायद इसलिए अजय ने इलाहाबाद विश्व विद्यालय की

प्रवेश परीक्षा पास करने के बाद भी एडमिशन इसीसी में ही लिया था।

इसीसी में उस समय मित्तल सर की हिन्दी की

क्लास इतना चर्चित थी कि, 

सच मानिए उनकी क्लास में आपको बिना

इनरोलमेंट कार्ड के प्रवेश नहीं मिल सकता था।

कारण यह था कि उनकी क्लास में इलाहाबाद भर

के पढाकू लडकों का जमघट लगता था।

सीएमपी, एडीसी, कुल भास्कर के साथ साथ खुद विश्व विद्यालय तक के छात्र आते थे।

माफ करना भाइयों आप केवल इतना ही मत समझना कि,

यह भीड़ केवल पढने वाालों की थी।

बल्कि इसमे कुछ दिल के मरीज भी हुआ करते थे। 

बढ़ी जब आस्था से आस्था 

अजय को अपने कालेज की बहुत खूबियों पर गर्व था। 

मसलन अजय को अपने कालेज की पढ़ाई और अनुशासन में गर्व था।

अजय को अपने मित्तल सर की लोकप्रियता में गर्व था।

अजय को किसी एक चीज पर और भी गर्व था। लेकिन यह बात 

वह कभी अपने होंठों तक में नहीं लाया था। 

इसलिए लोग कम ही जानते थे कि उसके इस गर्व की हकीकत क्या है?? 

दोस्तों, अजय को जिस पर गर्व था यह बात शायद कोई जान भी न पाता,

यहां तक कि खुद आस्था को भी नहीं पता था कि अजय को उस पर गर्व है।

एक दिन हुआ यूं कि जब मित्तल सर की क्लास शुरू होने को थी, 

और बच्चे क्लास में आने लगे

तो अचानक सब की नजर लेक्चर स्टैंड में लगे बोर्ड पर पड़ी।

बोर्ड पर कुछ गंदे कमेंट थे जो क्लास में ही किसी

पढने वाले बच्चे द्वारा लिखे लग रहे थे।

काफी ज्यादा गम्भीरता से तो सभी ने इस बात को लिया था लेकिन यह क्या ?

अगली सुबह क्लास का नजारा ही अलग था।

अजय क्लास के सबसे लम्बे चौड़े तगड़े साथी

डब्बू चौहान से गुत्थम गुत्थी कर रहा था।

चौहान जो सच में डील डौल में अच्छा था लगातार अजय से पिट रहा था ।

जब कई बच्चों ने मिलकर दोनों को अलग किया तब जाकर

अजय ने उसे पीटना बंद कर दिया,

और यह बुदबुदाता हुआ चला गया कि कोई भी क्यों न हो

मेरे क्लास में गंदी हरकत नहीं कर सकता।

आस्था के खिलाफ तो कतई नहीं ।

यही लास्ट वाले शब्दों ने उसके दिल का हाल सबके

सामने बयां कर दिया था।

धीरे धीरे मामला तो ठंडा हो गया लेकिन एक मामला ऐसा भी था

जो लगा तार गर्म हो रहा था।

और वह मामला था आस्था अजय का लगातार साथ दिखने का।

कुछ दिन बाद ऐसा भी वक्त आया कि दोनों ने अपने अपने खास दोस्तों से

अपने अपने दिल की सच्चाई भी बता डाली। 

और, प्यार हो गया 

आस्था का पूरा नाम आस्था रिजवी था।

वह पांच भाइयों के बीच बहुत ही लाडली अकेली बहन थी।

पुराना कटरा इलाहाबाद में नेतराम चौराहे के पास मनीष लाज उसके पापा का लाज था।

वैसे आस्था के पापा इलाहाबाद बोर्ड आफिस में अधिकारी थे, 

और ऊपर से इलाहाबाद में एक अतिरिक्त मकान था।

इसलिए इससे भी खूब पैसा किराए का  मिल जाता था।

यानी आर्थिक हालात सुपर थे।

अजय बेहद सामान्य परिवार का लेकिन पढने लिखने में होशियार लड़का था।

इलाहाबाद, पढने के लिए आया था।

पैसे की बेहतर पोजीशन नहीं थी इसीलिए वह इलाहाबाद में

घर घर ट्यूशन पढ़ता था, 

बाद में अपनी भी पढाई करता था।

अजय ने एक दिन खुलकर सब कुछ बता  दिया था।

और यह भी कह दिया था कि

आस्था अगर सच में तुम्हें मुझ पर यकीन हो और मेरी मेहनत पर भरोसा हो, 

तो मेरे साथ जिंदगी के सपने देखना। 

वर्ना तुम एक समस्या बन चुके इंसान से संबंध रखकर

खुद समस्या बनने की कोशिश न करना।

लेकिन आस्था सचमुच बहुत अच्छी लड़की थी ।

वह सच में अजय से प्यार करती थी।

इस लिए उसने साफ़ साफ कह दिया कि मुझे तुम पर भरोसा है और पूरी जिंदगी रहेगा। 

समय बदला, बहुत कुछ बदला 

कभी कभी लगता है कि सब कुछ ठीक ठाक है लेकिन हकीकत में

सब कुछ ठीक ठाक नहीं होता।

बीए करने के बाद अजय ने सोचा था कि जल्द ही किसी परीक्षा में

उसे सफलता मिल जाएगी, 

और वह आस्था को उसके पापा से जीवन भर के लिए मांग लेगा।

लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

अजय ने एक नहीँ अनेकों परीक्षाएं दी पर बताने लायक कुछ भी नहीं कर पाया।

अंतत:एक दिन ऐसा भी आया जब आस्था के पापा ने

खुद अजय को घर बुला कर आस्था के सामने उससे कहा कि,

उसे न तो सिविल सेवा परीक्षा की तरफ देखना चाहिए

और न ही रिजवी परिवार का दामाद बनने के सपने ही देखना चाहिए। 

क्योंकि हकीकत यही है कि तुम इन दोनों के

काबिल ही नहीं हो ।

यही शब्द अजय की जिंदगी के आखिरी शब्द हैं

जो उसने आस्था के संदर्भ मे सुने थे ।

इसके बाद अजय का क्या हुआ?

आस्था का क्या हुआ? कोई नहीं जानता ।

 सालों बाद आज दोनों एक दूसरे के सामने हैं

लेकिन हालात सिर से पैर तक बदले हुए।

आस्था के पापा के शब्द बाणों से आहत होकर अजय ने

इलाहाबाद तो छोड़ दिया लेकिन इरादा कतई नहीं छोड़ पाया था। 

दिल्ली में बड़ी बड़ी बिल्डिंगों की रखवाली करते करते, 

 एक दिन वह ऐसा कमाल करने में कामयाब हो गया

जिसकी कल्पना कम से कम आस्था के पापा को नहीं थी ।

अजय आज यूपी के एक जिले में जिलाधिकारी है।

 बीवी बच्चों वाला है।

वहीं दूसरी तरफ आस्था ने काफी मेहनत करके आज

उसी जिलाधिकारी की कुलीग तो है लेकिन अजय की जिन्दगी से बेहद दूर।

आस्था आज इसी जिले की एक अधिशासी अधिकारी है

लेकिन शाादी सुदा नहीं है ।

आज जब अजय जिलाधिकारी ज्वॉइन करने आए थे

तभी आस्था से कार्यालय में सालों बाद मुलाकात  हुई ।

लेकिन जब अजय ने आस्था की जिन्दगी में खाली पन या फिर

कहीं न कहीं अपना इंतजार देखा तो जैसे उनका वजूद ही हिल गया।

कहां वो अपने परिवार के साथ खुशी खुशी जिंदगी जी रहे थे। 

और कहाँ आस्था, 

जो बिना कोई बात किए ही खामोश जीवन में

उन्ही का बिना नाम लिए इंतजार कर रही थी ।

अजय ने जब हकीकत की जिंदगी में इस हालात को देखा

तो उनके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल पाया सिर्फ इसके

कि

काश,   तुम बेवफा होतीं।।  

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 05082018

 

 

 

 

 

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