आरक्षण की असली कहानी

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आरक्षण की असली कहानी 

आरक्षण की असली कहानी में आपका स्वागत है।

इस लिए नहीं कि आप आरक्षण

विरोधी हैं

या इस लिए नहीं कि आप आरक्षण समर्थक हैं ।

आरक्षण की असली कहानी में अपका स्वागत इस लिए है कि

आइए और बिना किसी पूर्वाग्रह के आरक्षण की असली  कहानी को समझिए। 

बावजूद इसके यदि आप आरक्षण के घोर विरोधी या समर्थक हैं तो

आरक्षण की असली कहानी में आप कतई सिरकत न करें।

आरक्षण वर्तमान में ऐसी हकीकत बन गया है जिसके बगैर

कोई भी दल या पार्टी अथवा कोई भी व्यक्ति या राज नेता

अपने अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकता।

आरक्षण आज कितनी महत्वपूर्ण सच्चाई है यह इसी बात से

पता की जा सकती है कि गुजरात का जो पटेल कुनबा

आज कल रह रह कर आरक्षण के लिए अपने घरों से मरने मारने के लिए निकल पडता है

कभी किसी जमाने में आरक्षण का सख्त विरोधी था ।

आरक्षण की असली कहानी में 

मेरे मन में यह बात बार बार आती है कि इस लेख की सबसे महत्वपूर्ण लाइन

आखिर मैं सबसे बाद में लिखूँ या सबसे पहले लिख दूँ।

खैर काफी सोचने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि मैं वह लाइन

आरक्षण  की असली कहानी में 

अभी ही लिखता हूँ ।

दोस्तों, आरक्षण की असली कहानी में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि,

लोकतांत्रिक व्यवस्था के नाम पर हमने कुछ ऐसे लोगों को भारत की गद्दी पर बिठाया है

जो अपनी हरकतों के कारण ज्यादा से ज्यादा

लोगों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करना कोई गलत काम नहीं मानते। 

आरक्षण की जड़ में आइए 

आरक्षण कीअअसली कहानी में यदि हम बात आरक्षण की जड़ की करें तो जनाब

यह सही है कि आरक्षण की अवधारणा संविधान से आई है

लेकिन आपको ताज्जुब होगा कि Sc/St आरक्षण का मौजूदा रूप

संविधान नहीं बल्कि संसद की देन है।

अदालत ने तो शुरू में ही कह दिया था कि

जाति और धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं हो सकता।

क्यों कि ऐसा आरक्षण संविधान के खिलाफ है।

अगर सरकार कानून लाकर संविधान में दिए गए बराबरी के मौलिक अधिकार में

अपवाद नहीं जोडती तो पिछड़े वर्ग को जाति के आधार पर

आरक्षण का कभी जन्म ही नहीं होता।

तब सम्भवतः आरक्षण की असली कहानी भी नहीं लिखनी पड़ती। 

यह बात 1951 की है जब… 

आरक्षण की असली कहानी में आगे की कहानी इस प्रकार है। 

यह घटना 1951 की है जब सबसे पहली बार अदालत ने

जाति और धर्म के नाम पर आरक्षण को नामंजूर कर दिया था।

क्योंकि अदालत की दलील थी कि इससे संविधान का ही उल्लंघन होता है।

इसके बावजूद हकीकत यह है कि आज तक कभी अदालत की बात मानना तो दूर

सुनी तक नहीं गई। 

क्योंकि हमारे घर की खेती यानी हमारी तथाकथित देश की सबसे बड़ी पंचायत उर्फ संसद से

कानून दर कानून आरक्षण के लिए निकलते रहे हैं

जिसकी बदौलत आरक्षण आज भी सख्ती से मुस्तैद है ।

आपको पता होगा शुरूआत में यह आरक्षण केवल एससीएसटी के लिए ही था।

बाद में इसे संसद की कृपा से पिछड़े वर्ग के लिए

नौकरी से पढाई तक के लिए अनुकूल बनाया गया। 

आप को एक और ताज्जुब हो सकता है कि इस देश में आरक्षण के लिए

कई बार संविधान संशोधन  हुए हैं, कभी इसे बढाने के लिए

तो कभी इसे घटाने के लिए। 

लेकिन आरक्षण का लाभ लेकर बराबरी पर पहुंच गई जातियों को

बाहर करने के लिए आज तक कभी सपने में भी प्रयास नहीं हुआ।

आरक्षण की असली कहानी की यह भी एक कहानी है। 

पिछड़ा वर्ग शब्द और संविधान 

शायद यह बात बहुत कम लोगों को पता होगी कि जब

संविधान में पिछड़ा वर्ग शब्द शामिल किया जा रहा था तो

संविधान के तमाम सदस्यों ने यह पूछा था कि,, 

आखिर इसमें कौन कौन लोग शामिल किए जाएंगे ?

इनकी पहचान कैसे होगी? 

तो जानिए अम्बेडकर जी ने क्या कहा था।

अम्बेडकर जी ने कहा था कि

पिछड़ा वही माना जाएगा जो सरकार की राय में पिछड़ा होगा ।

शायद आपको पता न हो OBC या अन्य पिछड़ा वर्ग यहीं से

आरक्षण की राजनीति में शामिल हुआ। 

भारत का संविधान कहता है कि भारत के किसी भी नागरिक के साथ

जाति, धर्म, वर्ण,  लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा।

भेदभाव की मनाही के इसी सिद्धान्त पर मद्रास हाईकोर्ट

और फिर सुप्रीम कोर्ट ने

जाति और धर्म आधारित आरक्षण रदद् कर दिया था । 

लेकिन तत्कालीन कानून मंत्री अम्बेडकर के नेतृत्व में

सरकार संसद में तुरंत एक कानून ले आई थी ,

जिससे संविधान का पहला संशोधन संभव 

 हुआ था।

इतना ही नहीं आरक्षण बनाए रखने के लिए अनुच्छेद 15 में उपधारा 4 जोड़ी गई थी।

जो कहती है कि,…. सरकार सामाजिक और

शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के उत्तथानके  लिए विशेष प्रावधान कर सकती है । 

यही वह दो लाइनें हैं जिनकी बदौलत

आरक्षण की वैसाखी आज तक बरकरार है। 

 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 11082018

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