क्या सच में संसद हमारी महा पंचायत है?

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क्या सच में संसद हमारी महा पंचायत है?

 

 क्या सच में संसद हमारी महा पंचायत है?

भारतीय होने के नाते हमें इस सवाल के जवाब पर हरदम गर्व होता है,

क्योंकि हमें सिर्फ चेतना में ही नहीं बल्कि अचेतन में भी पता होता है,

कि हमारे देश की संसद हमारी अपनी सबसे बड़ी पंचायत है । 

समाज में पंचायत की व्यवस्था  हमारे देश में वैदिक समय से ही गतिशील हो रही  है।

हां यह सच है कि उसके रूप जरूर बदलते रहे हैं.

हमारी वर्तमान लोकतांत्रिक प्रणाली वास्तव में इसी महत्वपूर्ण व्यवस्था का आधुनिकीकरण है,

जिसका प्रतीक है हमारे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र  नई दिल्ली में स्थित,

हमारा संसद भवन … या हमारी अपनी सबसे बड़ी महा पंचायत ।

एक सवाल है

सवाल उठता है कि क्या सचमुच आज हम जिस  संसद को जानते हैं, सचमुच  यह हमारी राष्ट्रीय महापंच है?

या फिर क्या सचमुच हमारी संसद,

सचमुच हमारी लोकतांत्रिक सभ्यता का प्रतिनिधित्व करने वाली  जगह है?

इस तरह के हमारे प्रश्नों को पैदा होने का कारण है,

हमारी वर्तमान लोक सभा की परंपरा  का लगातार कमतर  होना ।

आज हालात यह हैं कि हमारे प्रधान मंत्री अपना महत्वपूर्ण व्याख्यान दे रहे हैं,

तो हमारे विपक्ष के जिम्मेदार सांसद शोरशराबे में मस्त हैं ।

सवाल यह  भी  है कि प्रति सेकेंड  करीब दस लाख रुपये खर्च करने वाली हमारी अपनी,

सबसे बड़ी महान पंचायत क्या सचमुच इस तथ्य के साथ न्याय कर पा  रही है?

इस लोकतांत्रिक  व्यवस्था में यह बनावटी अवरोध आखिर क्यों?

क्या संसद भवन में बैठे  और लाखों जन-समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे अपने प्रतिनिधि,

क्या सच में अपने तथाकथित  आचरण से देश और देश की जनता के साथ न्याय कर रहे हैं?

प्रश्न यह भी है

प्रश्न यह भी है कि क्या, संसद भवन के अंदर घटित होने वाली इन अनावश्यक गतिविधियों से,

हमारी राष्ट्रीय महापंचत की गरिमा का क्षरण  नहीं होगा? 

क्या सचमुच हमारी संसद हमारी महान पंचायत व्यवस्था की निशानी है?

एक  सवाल यह भी पैदा हो रहा है कि

क्या कारण है कि दुनिया हमें दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहती है

और हम हैं कि उसकी उल्टी गिनती चालू करना चाहते हैं?

 इसका एक  कारण यह भी है कि हमारे जनप्रतिनिधि लगातार संसदीय आचरण को भी त्याग कर रहे हैं .

    कभी-कभी संसद भवन में ऐसा विचित्र माहौल भी देखा जाता है ,

जब कोई राष्ट्रीय महत्व का विषय बहस में गतिशील होता है तो हमारे माननीय,

अपनी जगह में नहीं बल्कि कैंटीन में तशरीफ रखे हुए देखे जाते हैं ।

जनता की चाहत

बदलते समय की या जनसाधारण की आकांक्षा  यही है कि हमारे जनप्रतिनिधि ऐसा व्यवहार करें  कि  सचमुच हमारे धरोहर सिद्ध हों ।

मुझे याद है कि एक बार जब पूर्व राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम बच्चों से मुलाकात करने एक

स्कूल गए थे तो,

किसी बच्चे ने  उन से  ऐसा सवाल किया था कि राष्ट्रपति को जवाब देने में असहजता महसूस हुई  थी ।

जी हां दोस्तों, वहां किसी बच्चे ने राष्ट्रपति महोदय से यह पूछा था कि
“सर रोज रोज राजनैतिक प्रतिनिधियों  के गिरते आचरण को देखते हुए हमें बताइए कि हम किसके जैसा बनें ? “
राष्ट्रपति को इस प्रश्न के उत्तर में कठिनाई हुई थी

 सच कहें तो  लगातार गिरती हुई संसद की गरिमा ने,

खुद से  भी यही प्रश्न पूछती होगी

 कि

“क्या सचमुच हमारी संसद देश की सबसे बड़ी महा पंचायत है? “

सबसे बड़ी पंचायत कहने का आशय, उसके क्षेत्रफल से नहीं है ।

कथाकार प्रेम चंद्र की सर्वकालिक कहानी पंचायत में वर्णित   पंचायत की  गरिमा से है,

जिसमें एक कुटिल व्यक्ति की आकांक्षा में मातमी पानी  डालकर एक सार्वभौमिक सत्य की प्रतिष्ठा होती है ।

यानी पंचायत की वास्तविक  गरिमा को स्थापित किया गया था ..

यदि आज यह प्रश्न पैदा हुआ है कि क्या 
वास्तव में हमारी पंचायत देश की  सबसे बड़ी महा पंचायत है?

तो इसका जवाब भी हमारी राष्ट्रीयता का प्रतीक संसद से ही मिलना  चाहिए क्योंकि मैंने सुना है कि
सच्चाई का सबसे उचित  सम्मान  उसका प्रयोग है न कि उसकी महिमा मंडन …।
धन्यवाद
लेखक: के पी सिंह
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08022018