चुनाव चिन्हों की रोचक कहानी

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हांथ का पंजा चुनाव चिन्ह कैसे बना? 

इसी के साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि कमल के फूल और हाथी के साथ साथ साइकिल आदि चुनाव के निशान कैसे बनते हैं? 

यह एक दिलचस्प तथ्य है लेकिन इससे भी बड़ा दिलचस्प तथ्य यह है कि भारत में ही नहीं,

किसी प्रकार के चुनाव में होने पर,

उम्मीदवार को चुनने के लिए कोई न कोई चुनाव चिह्न निश्चित रूप से होगा

बात जहां तक ​​भारत की है तो यहां न केवल हर दल का कोई न कोई चुनाव चिह्न है,

बल्कि लगभग हर दल के चुनाव चिह्न के किसी न किसी को कोई दिलचस्प कहानी नहीं है,

और किसी न किसी विशेष टोटके का असर ज़रूर है।

       कहानी कांग्रेस के                       पंजे की 

हांथ का पंजा कांग्रेस का चुनाव चिन्ह कैसे बना?   

इसकी भी एक कहानी है।

सच कहें तो चाहे कांग्रेस का पंजा हो या फिर भाजपा का कमल का फूल,

या फिर बसपा का हाथी या सपा की साइकिल। 

सभी की दिलचस्प कहानी का मजेदार इतिहास है। 

तो आइए बात कांग्रेस से शुरू करते हैं :

कांची कामकोटि मठ वाराणसी के प्रबंधक वी एस सुब्रमण्यम  के मुताबिक,

इंदिरा गांधी जब गर्दिश में थीं तब उन्होंने शंकराचार्य से मिलने की इच्छा जताई थी।

शंकराचार्य उस समय मदन पल्ली में थे। 

श्रीमती गांधी आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन भास्कर राव के साथ मदन पल्ली गईं। 

जहां उन्होंने शंकराचार्य से काफी देर तक बात की। 

शंकराचार्य पूरे समय मौन रहे। 

जब श्री मती गांधी उठने लगीं तो शंकरायणों ने उन्हें दाहिना हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया।

इंदिरा गांधी ने उसी क्षण हाथ के पंजे को अपना चुनाव चिन्ह बनाने का निर्णय ले लिया। 

ताज्जुब यह है कि उस समय आंध्र प्रदेश और चार राज्यों में विधान सभा चुनाव चल रहे थे। 

इंदिरा गाँधी ने अपनी पार्टी कांग्रेस आई का निर्माण किया था,

इंदिरा जी ने हाथ के पंजे को न केवल अपना चुनाव चिन्ह बनाने में सफल रहीं,

बल्कि चुनाव परिणाम भी उनके लिए सुखद रहे थे। 

बात भारतीय जनता पार्टी की 

 

“हांथ का पंजा” कांग्रेस का चुनाव चिह्न कैसे बना है?

यदि इसी तरह की प्रश्न है कि भाजपा के बारे में पूछा जाए?

आखिर बीजेपी का चुनाव चिन्ह कमल का फूल कैसे बना है?

तो जनाब भी इसके बहुत ही दिलचस्प इतिहास है

जनता पार्टी से जब जनसंघ के लोगों को अलग किया गया,

तो एक नई पार्टी बनाने का काम तत्कालीन पार्टी महासचिव मुरली मनोहर जोशी को सौपा गया।

पार्टी बनाने से पहले मुरली मनोहर जोशी,

लाल कृष्ण आडवाणी, सुंदर सिंह ,ने एक देशव्यापी दौरा किया।

इस दौरान ये लोग सांसद, विधायक और चुनाव लड़ चुके लोगों से,

एक शपथ पत्र भी एकत्र कर रहे थे। 

जब चुनाव चिन्ह चुनने की बारी आई 

जब भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद उसके चुनाव चिन्ह को चुनने की बारी आई तो,

इन तीनों नेताओं ने बहुत गहन चिंतन किया। 

तीनों नेताओं ने मिलकर जो चुनाव चिन्ह का चुनाव किया  वह कमल का फूल था। 

इसका कारण बताते हुए जोशी अक्सर कहा करते हैं,

कमल भारतीय संस्कृति, समृद्धि और सौन्दर्य का प्रतीक है। 

1857 की क्रांति का निशान भी रोटी और कमल का फूल ही था।

आज आप भाजपा का चुनाव चिन्ह कमल में पांच पत्ते ऊपर और दो नीचे पत्तों को देख सकते हैं,

यह  मुरली मनोहर जोशी की देन है। 

हालांक प्रमोद महाजन पार्टी का चुनाव चिह्न तीर कमान रखना चाहते थे। 

लेकिन अंत में: कमल के फूल को जीत मिली। 

आओ बात करें सपा की 

“हाथ का पंजा” कांग्रेस का, कमल का फूल भाजपा का चुनाव चिन्ह कैसे बने? 

दिलचस्प कहानी है मुलायम सिंह यादव की पार्टी समाजवादी पार्टी  की भी। 

 समाजवादी पार्टी के चुनाव चिन्ह के लिए जनेश्वर मिश्र, बेनी प्रसाद वर्मा,

मुलायम सिंह यादव, बृजभूषण तिवारी

और आजम खान आदि मधु लिमये से मिले थे।

उसी समय जनेश्वर मिश्र फूलपुर से पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे

वह अपने प्रचार में साइकिल से काफी घूमते थे।

तभी यह विचार हुआ कि क्यों न साइकिल को ही चुनाव चिन्ह बनाया जाए?

यद्यपि असम गण परिषद ने भी साइकिल चुनाव चिह्न की मांग की गई थी,

लेकिन अंत में चुनाव चिन्ह की लड़ाई में सपा को जीत मिली थी।

हांथी कैसे हुआ बसपा का 

बसपा को हाथी चुनाव चिह्न कैसे मिला यह भी कम दिलचस्प कहानी नहीं है। 

पहले यह हाथी चुनाव चिन्ह रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया का था

उस समय कांशीराम बाम सेफ और बीएस 4 जैसे संगठन चल रहे थे।

इसीलिए कांशीराम आरपीआई के संपर्क में थे। 

कांशीराम ने जब एक नई पार्टी बनाने का प्रस्ताव आरपीआई के सामने रखा तो,

आरपीआई नेता कांशीराम के सामने आरपीआई में विलय की बात की। 

कांशीराम राम ने एक शर्त रखी कि अगर आप को आसन्न चुनाव में एक करोड़ मत मिलेगा तो, 

मैं अपना विलय तुम में कर दूंगा वरना आप मुझे यह चुनाव चिह्न मुझे दे देंगे। 

नतीजा आया तो पता चला आरपीआई को एक करोड़ का चौथा हिस्सा भी नहीं मिला।

बस फिर क्या हुआ हाथी चुनाव चिन्ह अब कांशी राम का हो चुका था। 

ध्यान देने की बात यह है कि कांशीराम के साथ इस पूरी प्रक्रिया में

बस्पा की ओर से राजबहादुर, दडु प्रसाद, आरके चौधरी,

बरखू राम वर्मा आदि के साथ रहे थे।

 

धन्यवाद KPSINGH06032018

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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