आरक्षण के लिए उत्पात

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आरक्षण के लिए उत्पात 

आरक्षण के लिए उत्पात मचाना

या आरक्षण के नाम पर

उत्पात मचाने के लिए उकसाना आज बेहद आम बात हो गई है ।

राजनीति का आज सबसे अधिक सरलीकरण यदि किसी एक

चीज के लिए हुआ है तो

वह है आरक्षण की मांग और इसी बहाने किया जाने वाला उत्पात।

ताज्जुब है इस देश का हर पढा लिखा इंसान जानता है कि आरक्षण क्या है?

और यह किसके लिए है बावजूद सच्चाई यह है कि लगभग हर राजनीतिक दल

और सक्रिय राजनीति से जुड़े हर शख्स ने आरक्षण के नाम पर

अंधेरगर्दी करने में कोई संकोच  नहीं किया। 

आरक्षण के नाम अंधेर 

आरक्षण के नाम पर असंगत, अवैध और अराजक

मांग करने का सबसे हालिया और घटिया प्रदर्शन पूरे देश ने

25 जुलाई 2018 को उस समय देखा जब एक नए शिगूफा अर्थात

मराठा आरक्षण के नाम पर आरक्षण के बहाने सड़क पर

नंगा नाच करने की दूकान चलाने वालों की चांदी हो गई।

आरक्षण के नाम पर    हालिया और घटिया    प्रदर्शन 

आरक्षण के नाम पर जो सबसे हालिया और घटिया प्रदर्शन देश ने देखा है

वह महाराष्ट्र में मुंबई और उसके आसपास के जिलों में मराठाओं का चल रहा अतार्किक और अराजक आंदोलन है।

इस तथाकथित आंदोलन में  मूर्खता की हद तक दुष्टता का प्रदर्शन करने में

जो रत्तीभर भी संकोच नहीं कर रहे

वे खुद को दीन हीन गरीब और जरुरतमंद दिखाने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

यह लोग  जो आजकल मराठा आंदोलन का झंडा बुलंद कर रहे हैं

वह सच में आरक्षण की मांग के बहाने

अपनी अराजक और हिंसक प्रवृति का मजा ले रहे हैं।

मराठा आंदोलन के नाम पर बुद्धवार 25 जुलाई 2018 को

इनकी वास्तविकता का पता तब चला

जब मुंबई में प्रवेश करनेवाले सभी मार्गों पर लंबा जाम

और हिंसक तोड़ फोड़ की अमानवीय घटनाएं देखी गईं।

हद तब हो गई जब इस बंद को बंद करने की घोषणा के बाद भी

यह हिंसक खेल जारी रहा। 

हिंसक कारनामा का बहाना 

महाराष्ट्र में मराठा समुदाय शिक्षा एवं सरकारी नौकरी में आरक्षण की असंवैधानिक और असंवेदनशील मांग कर रहा है।

हुआ यह कि सोमवार 23 जुलाई को अपनी इसी मांग को लेकर

एक 28 वर्षीय युवक काकासाहब सिंदे ने गोदावरी में

छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली थी।

जिसके बाद तथाकथित जन कल्याण के नाम पर किया जाने वाला आंदोलन हर आदमी की परेशानी का शबब बन गया।

मंगलवार को महाराष्ट्र बंद की घोषणा की गई थी जिसका असर

औरंगाबाद समेत पूरे महाराष्ट्र में देखा गया।

बुधवार 25 जुलाई 2018 को हद ही हो गई जब मुंबई समेत

इसके पड़ोसी क्षेत्रों जैसे नवी मुंबई, ठाणे  रायगढ़, पालधर आदि में हिंसक बंद देखा गया। 

क्या सही है यह  कारनामा? 

 

आरक्षण की मांग के नाम पर उत्पात मचाया जाना क्या

किसी भी तरीके या तर्क से सही कहा जा सकता है?

इसका जवाब है कतई नहीं।

क्योंकि दोस्तों हकीकत कुछ और है जिसे आप सोच भी नहीं सकते।

इस देश में आरक्षण के नाम पर नौटंकी करने वालों की कमी नहीं है।

कभी जाट आंदोलन के नाम पर,

कभी पाटीदार आंदोलन के नाम पर,

कभी गुर्जर आंदोलन के नाम पर, कभी कापू आंदोलन के नाम पर।

कभी आलू के नाम पर कभी बैंगन के नाम पर यानी कभी फलां के नाम पर,

कभी ढिमका के नाम पर जो अक्सर आंदोलन हमें दिखते हैं

दरअसल वह किसी सार्थक परिणाम की आकांक्षा के साथ किए जाने वाले आंदोलन नहीं हैं। 

बल्कि हकीकत यह है कि यह सब आरक्षण की मांग के बहाने

किए जाने वाले हिंसक उत्पात हैं

जो रत्तीभर भी नागरिकों या किसी समुदाय विशेष का हित नहीं रखते । 

इस देश का हर आरक्षण बाज यह जानकारी रखता है कि

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बहुत पहले यह कह दिया था

कि 50 %से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता।

बावजूद इसके तेलंगाना, आंध्र प्रदेश चुनाव में बैरिस्टरों से भरी पार्टी ने

एन चुनाव के वक्त पर मुसलमानों के लिए 5%आर की घोषणा करती है।

यूपी चुनाव के पहले माननीय मुला सिंह मुसलमानों के लिए आरक्षण की घोषणा करते हैं।

घोर आश्चर्य इस बात का है कि आरक्षण को रेवड़ी समझ कर बांटने वाले

और सदा बरत समझकर आरक्षण चाहने वाले दोनों जानते हैं

कि न तो हम आरक्षण दे सकते हैं और न ही हम आरक्षण प्राप्त कर सकते हैं।

इसके बावजूद सड़क पर नंगा नाच और अतार्किक आरक्षण की मांग के बहाने

उत्पात मचाने वाले मौज कर रहे हैं ।

सड़क से संसद और संसद से समाज सब स्वाहा हो रहा है इस मूर्खता पूर्ण आचरण से

फिर भी हम सुधरने को तैयार नहीं है आखिर क्यों?

शायद कोई नहीं जानता या जानना नहीं चाहता। 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 26072018

 

 

 

 

 

 

 

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