क्या सच में हम आजाद हैं?

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क्या सच में हम आजाद हैं?

क्या सच में हम आजाद हैं, और क्या सच में हम आजादी का मूल्य समझते हैं?

दोस्तों यह एक ऐसा सवाल है जो हमें अपने आप से पूछना चाहिए।

आप जरूर कहेंगे क्यों पूछना चाहिए?

तो इसका उत्तर यह है कि हमें इस बात का पता तो होना ही चाहिए कि

आखिर लाखों लोगों ने जिस आजादी के लिए अपना सर्सस्व न्यौछावर किया था

क्या सच में वह हासिल है हमें या फिर इसके हासिल होने का हमें भ्रम मात्र है ।

आजादी हमें क्यों मिली थी? 

क्या सच में हम आजाद हैं?

इस सवाल का जवाब जानने के पहले हमें यह जानना होगा कि आखिर हमें

आजादी क्यों और किस से मिली थी।

रोटी के टुकड़े तो तब इंसान एनकेनप्रकारेण पेट में डालता ही था फिर

आखिर आजादी के लिए हमने संघर्ष क्यों किया था?

मेरी समझ में इसका उत्तर यह है कि हमने आजादी रोटी के टुकड़ों की

संख्या बढाने के लिए नहीं चाही थी

बल्कि आजादी हमने अपने मनुष्य होने के प्रमाण के रूप मे चाही थी।

क्योंकि यह सच किसी से छिपा नहीं है कि गुलाम मनुष्य सच में मनुष्य ही नहीं होता।

हकीकत यही है कि हमने खुद को मनुष्य साबित करने के लिए आजादी हासिल की थी।

हां यह बात जरूर दीगर हो सकती है कि यह आजादी या तो पूरी नहीं मिली

या फिर सबको नहीं मिली।

तभी तो यह सवाल कायम है कि क्या सच में हम आजाद हैं? 

क्या कहते हैं आज के हालात 

क्या सच में हम आजाद हैं?

आप निश्चित ही यह सवाल करेंगे कि आजादी की चर्चा में आज के हालात कहां से आ गए?

तो इसका उत्तर यह है कि सच्चाई यह भी है कि हमने आज के ही

हालात ठीक करने के लिए आजादी की महती कामना की थी

और उसे हासिल भी किया था। 

हां यह बात दीगर है कि हमें सच्ची आजादी की आज भी सिद्दत से तलाश है।

हो सकता है आपको लगे कि हम अच्छे खासे आजाद तो हैं फिर भी

इस कडुई चर्चा का उद्देश्य क्या है? 

तो जनाब इस प्रश्नवाचक चर्चा का कुछ मतलब जरूर है।

हम आजाद हैं इस बात से कतई इन्कार नहीं किया जा सकता

लेकिन क्या हमारी आजादी हमें वह गौरव दे पाई है जिसकी हमें कभी तलाश थी?

 दुर्भाग्य से वह तलाश आज भी जारी हैऔर हम बस यही पूछे जा रहे हैं कि

क्या सच में हम आजाद हैं? 

आजादी और राजनीति के आज के हालात 

क्या सच में हम आजाद हैं?

आजादी के 70 साल के बाद हमें राजनीति के आंगन में अब तक

राम राज का बिरवा यानी पेड़ काफी बड़ा कर लेना चाहिए था

लेकिन अफसोस है कि हम उस बिरवा को बडा करना तो दूर ठीक से रोपित तक नहीं कर पाए हैं ।

मैं नकारात्मक चर्चा करने के पक्ष में नहीं हूँ और मुझे गर्व है अपने देश की राजनीतिक ऊंचाई पर

लेकिन इस सच से भी आंख नहीं मूंदी जा सकतीं कि हमारी राजनीति का

उदात्त स्तर आज कमतर हो चला है।

राजनीति ही क्यों शिक्षा और स्वास्थ्य के हालात हौसले वाले कम काम चलाऊ ज्यादा हैं।

कल्पना कीजिए मृत शरीर को कई कई किलोमीटर यदि

आज भी साइकिल या सिर में ढोना पड़ता है तो यह सब अमानवीय है। 

तो क्या इसी का नाम आजादी के बाद बेहतर हालात हैं? 

इतना ही नहीं हम एक बार नहीं हजार बार चाहते हैं कि हमारे देश में बुलेट ट्रेन का जाल हो

लेकिन उसकी कीमत तो तय होना ही चाहिए ।

किसी चालू डिब्बे में सफर करने वाले के दिल से पूछिए फिर बताइए

पहले इस डिब्बे के हालात सुधरना चाहिए फिर बुलेट ट्रेन का भी स्वागत होना चाहिए।

हमने आजादी के बाद बहुत सारी उचाइयों को हासिल किया है इसमें कोई शक नहीं, 

लेकिन इस बात से आप कतई इन्कार नहीं कर सकते हैंं कि अभी भी बहुत कुछ बाकी है।

क्या यह किसी भी कीमत में सुखद कहा जा सकता है कि देश की अजीब आर्थिक नीतियां

इतनी भयंकर अजीब हैं कि कुल देश की पूंजी और संपत्ति केवल कुछ ही लोगों के पास अटक गई है ।

ऐसे हालात में हमारे हलक से बस एक ही आवाज आती है कि क्या सच में हम आजाद हैं? 

आप को क्या लगता है कि आरक्षण आरक्षण आपके बेहतरीन खेल को कोई समझता नहीं ?

🔴यह आरक्षण का झुनझुना अब बजना बंद होना चाहिए।

🔴धर्म की दूकानें अब कभी नहीं खुलनी चाहिएं ।मजहब देखकर

आदमी की औकात तय होना बंद होना चाहिए ।

🔴जाति की दीवार आखिर कब गिरेगी. इसकी भी तो चर्चा होनी चाहिए ।

🔴70 साल से मजा कर रही देश विरोधी पार्टियों की अब नींद हराम होना चाहिए।

अगर फिर भी यह सब हासिल नहीं होता तो यह सवाल तो बनता ही है मेरे दोस्तों कि

क्या हम सच में हम आजाद हैं? 

धन्यवाद

के पी सिंह किर्तीखेड़ा 15082018

 

 

 

 

 

6 COMMENTS

  1. नमस्कार आप ने बहुत बढ़िया तरीके से समझाया है आप का बहुत बहुत धन्यवाद करता हूँ सर

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