जाति प्रथा की हकीकत क्या है?

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      जाति प्रथा की

      हकीकत क्या है? 

जाति प्रथा की हकीकत क्या है?

यह एक ऐसा प्रश्न है कि इसके जवाब मे बड़ी मोटी-मोटी परिभाषाएं मौजूद हैं।

लेकिन यहां उनका उल्लेख नहीं करना है ।सिर्फ सरल शब्दों में कहना है कि

“जब एक लाल खून वाला आदमी दूसरे लाल खून वाले आदमी से ,

खुद को बेहतर मानकर ।

दूसरे को कमतर मानता है  तो यह भावना, यह हकीकत ही,

 जातिवाद या जातिवादी मनोवृत्ति कहलाती है ।”

आप इस परिभाषा से सहमत हैं या नहीं हैं इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता लेकिन 

हकीकत में इसी को जातिवाद कहते हैं।

सर्व प्रथम समाज में काम के आधार पर बंटवारा था और सभी को समान प्रतिष्ठा भी प्राप्त थी,

लेकिन इसमें खराबी तब आई  जब, काम के आधार पर  नहीं,

बल्कि जन्म के आधार पर व्यक्ति की पहचान शुरू हुई।

और प्रतिष्ठा भी कर्म के आधार नहीं,

बल्कि जन्म या जाति के आधार पर मिलने  लगी ।

परिणाम स्वरूप प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्ति इतराने  लगे तो,

जाति के कारण प्रतिष्ठा से वंचित लोग विद्रोही होने लगे।

आज जाति विवाद इसी  तीन तिकड़म  का नाम है।

यानी जिसको किसी के सामने अतार्किक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है तो जाति उसके लिए अच्छी है।

लेकिन जिसके लिए किसी के सामने अतार्किक प्रतिष्ठा की प्राप्ति का कोई विधान नहीं है  ,

उसके लिए जाति खराब होती है ।

आप सोचते होंगे  कि आखिर इस अमानवीय

और बर्बर जातिभेद का असली दोषी  कौन है?

क्या इसके लिए असली दोषी ब्राह्मण हैं?

या फिर इस जाति की जकड़न के लिए असली दोषी क्षत्रिय हैं ।

कम जानकारी वाले लोग इस भयंकर जाति की भावना को

भटकाने की गरज से कभी कुछ कहते हैं तो कभी कुछ कहने की कोशिश करते रहते हैं ।

कुछ लोग ब्राह्मण वर्ग या सवर्ण को कहेंगे,इसका दोषी तो

कुछ लोग किसी और का नाम लेना चाहेंगे 

लेकिन जो सचमुच जानकार हैं,

वे जानते हैं कि आज के आधुनिक भारत में जाति ही यदि ,

सबसे बड़ा सत्य बन गई है तो इसका  कारण हर वर्ग है।

क्या ब्राह्मण?

क्या क्षत्रिय?

क्या वैश्य?

क्या शूड़?

यह सब दोषी हैं भारत में जाति को बनाए रखने के लिए।

क्या कहता है दुनिया का सबसे प्राचीन ग्रंथ 

भले ही पूरी दुनिया न मानती हो

लेकिन हम भारतीय लोग तो यही मानते हैं कि वेद विश्व के प्राचीन ग्रंथ हैं।

और उनमें भी ऋग्वेद दुनिया का सबसे प्राचीन ग्रंथ है।

तो आइए पता है कि यह क्या लिखा है इस निरंकुश जाति के बारे में,

● कोई ऊँचा नहीं

● कोई नीचा नहीं

● सभी समृद्धि और विकास की ओर अग्रसर हो रहे बंधु बांध केवल मात्र हैं।

● सभी उसी देवता के पुत्र हैं।

● सभी प्राणियों के दिल में उसी देवता का वास है।

यह सब आपत वचन हमारे सबसे मान्य, प्राचीन और पवित्र ग्रंथ ऋग्वेद के शब्द हैं।

शायद इन शब्दों को पढ़ने के बाद  स्वामी विवेकानंद जी ने

जाति आधारित भारतीय तथाकथित समाज में व्याप्त जातिवाद को अधर्म कहा था।

आज न तो विवेक है न ही विवेक की विचारधारा है।

कितने गजब की बात यह है कि एक तरफ हम ऋग्वेद को दुनिया के सबसे प्राचीन ग्रंथ मानते हैं,

और चाहते हैं कि लोग पूरे विश्व में सम्मान करें 

लेकिन दूसरी ओर खुद हम उसी वेद की रत्तीभर बात मानने को तैयार नहीं होते ।

जाति किसका फितूर है? 

जाति किसका फितूर है?

इस अटपटे  प्रश्न का बड़ा चटपटा उत्तर है।

लेकिन आइए जवाब पढ़ने की बजाय   इन लाइनों को पढ़ें ।

हमारे पंडित महाराज जब भी कोई क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र को देखते , हैं

तो गर्व से भयानक अट्टहास  के साथ खुशी प्रकट करते हैं ।

क्योंकि इनका अस्तित्व ही इन तीनों को देखकर सिद्ध होता है ।

अब आप ही बताओ ये जाति को क्यों खराब कहेंगे?

अब आइए ठाकुर बाबा की बात करें।

जब भी यह महाशय वैश्य  या शूद्र को देखते हैं 

तो मूछों में ताव  देकर अपनी जाति की महानता पर फूल जाते हैं।

इसी तरह वैश्य भाई लोग शूद्र नामक प्राणी को देखकर गर्व से डूब जाते हैं।

तो कहने के लिए हम कहते हैं कि जाति खराब है

लेकिन यदि हम जाति के नजदीक जाकर देखते हैं तो सभी जाति के रथ पर सवार मिलते हैं ।

● चमार  धोबी को अछूत मानना ​​है।

● धोबी चमार को  महा आछूत मानता है।

● दर्जी खटीक को नही छूता ।

● खटीक पासी का छुआ नहीं खाता।

● पासी डोमार की छाया से ही अशुद्ध हो जाता है।

● डोमर भी इस तरफ के डोमर ,उस तरफ के डोमर में बांटा है।

अब कोई विद्वान बताए कि जाति का मजा किसको नहीं आता ?

सच यह है कि हम सब जाति के नाम पर सिर्फ ढोंग करते हैं।

जाति खत्म नहीं करना चाहते ।

और सच यह है कि इस  जाति की हकीकत में हम सब भागीदार हैं ।

जिसमे देखा जाए  तो सब दोषी हैं।

हम सबको अपनी अपनी गिरेबान  में झांक कर

अपने वास्तविक चेहरे को देखने की ज़रूरत है

 

धन्यवाद

लेखक: के पी सिंह

30 032018 

 

 

 

13 COMMENTS

  1. भौतिक विज्ञान के साथ साथ आध्यात्मिक ज्ञान के विकाश से ही जातीवाद का अन्त हो सकता है।

  2. जातिवाद को बदलना आसान नहीं है क्योंकि देखा जाए तो इंसान के कर्मो का ही प्रभाव होता

  3. सर, यह पोस्ट तार्किक विचारणीय और गम्भीर चिंतन से भरा है |कुछ देर ठहरकर अपने – आप से प्रश्न किया कि क्या मैं भी इस दुर्भावना से ग्रसित हूँ ? जवाब मिला कि चाहे हम खुलकर इसका प्रदर्शन नहीं करते हैं पर अन्तर्मन के किसी कोने में यह विचारधारा दवी हुई जरूर है |सभी जीवित प्राणियों से प्रेम करके इस दुर्भावना को दूर किया जा सकता है |

  4. Agar ham chahe to jati pratha khatam ho Santa hai pahle hamko badalna hoga bund bund se hi talab bhata hai agar koi aadmi dusare cast ke sath marriage Kate

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