हमारी वैश्विक पूंजी अराजकता या आन्दोलन?

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हमारी वैश्विक पूंजी अराजकता या आंदोलन 

हम भारत वासियों की पहचान सदैव से ही सत्य, अहिंसा, और शांति बना रही है।

हम इसे समझते हैं और समझते रहेंगे।

हां, यह बात दीगर है कि कुछ लोग हमारे इस ख्याल से,

हमारी खामी भी समझने की गलती करते हैं, करते हैं और करते रहेंगे।

हमारे सत्य, अहिंसा और शांति नीति या संकल्पना को,

कुछ विदेशी आक्रमणकारियों ने हमारी कमजोरी समझ ली,

हमें मिटाने की असफल कोशिश भी की

लेकिन भारत की प्राचीन परंपराओं का अर्थ है, अहिंसा और शांति का,

बल पर हम कल भी बने और कल भी बने रहेंगे

यह हमारे सभ्यता और संस्कृति का अटल विश्वास है।

हमारे सभ्यता और संस्कृति में सम्राट अशोक, 

महात्मा गौतम बुद्ध, और राष्ट्र पिता महात्मा गांधी के आप्त वचन,

इस तरह व्याप्त हैं कि हम इस असाधारण पूंजी के बल पर ,

विश्व नहीं पूरी धरती को जीत सकते हैं ।

कहने का तात्पर्य यह है 

जी हां, दोस्तों इस भूमिका का कुल तात्पर्य यही है कि ,

हमने कभी भी भारत भूमि में आन्दोलन के नाम पर अराजकता को स्वीकार नहीं किया ।

हमारी परम्परा की यही निशानी है कि हमने जब भी अपनी बात शून्य से शिखर तक,

पहुंचने की कोशिश की है तो सदैव आन्दोलन तो किया है।

लेकिन कभी आन्दोलन के नाम पर अराजकता नही किया है ।

क्योंकि हम भारत वासी सदैव यह मानते रहे हैं कि सत्य अहिंसा से बड़ा,

कोई हथियार या अपनी बात कहने का माध्यम नहीं है ।

इसकी जीती जागती मिसाल हैं हमारे बापू और उनके तमाम वह आन्दोलन,

जिन्होने अपनी सादगी की लाठी से सचमुच के लठेतों को काबू में किया है ।

महात्मा गांधी हमारी अनमोल पूंजी 

अपना विरोध जाहिर करने के लिए जो लोग हिंसा के रास्ते पर चलने को आतुर हो जाते हैं,

उन्हें इतिहास की कुछ बेहद खासमखास  घटनाओं से सीखना ,

और साथ ही सबक लेना चाहिए ।

महात्मा गांधी ने देश को आजादी दिलाने में एक नहीं सैकड़ों  बार आन्दोलन किया लेकिन ,

कमाल की बात यह है कि उन्होंने कभी भी हिंसा का सहारा नहीं लिया ।

इतना ही नहीं अगर कभी किसी आन्दोलन कारी ने,

हिंसा की कोशिश भी की तो महात्मा गांधी ने पुरजोर तरीके से ,

हिंसा युक्त आन्दोलन का बहिष्कार किया है ।

जब गांधीजी ने वापस लिया आन्दोलन 

दोस्तों यह केवल किताब की लिखी बात नहीं है कि हमारे बापू जी अहिंसा के पुजारी थे ।

सच यह है कि महात्मा गांधी मन, वचन, कर्म से अहिंसा के पुजारी थे ।

बात सन 1919 के असहयोग  आन्दोलन की है ।

जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद 31 अगस्त 1920 को महात्मा गांधी ने ,

अंग्रेजों के खिलाफ एक आन्दोलन की अगुवाई की थी ।

इसके लिए लोगों ने विरोध जताने के लिए सार्वजनिक परिवहन को त्याग दिया,

ब्रिटिश सामान की होली जलाई जिसे रवींद्र नाथ टैगोर ने यद्यपि निष्ठुर होली कहा था ।

लोगों ने स्वदेशी यानी स्थानीय चीजों को महत्व देना प्रारंभ कर दिया ।

ब्रिटिश कपड़ों को जनता ने लगभग त्याग दिया ।

सभी दफ्तर व फैक्ट्री बंद कर दी लोगों ने अंग्रेज़ी स्कूलों का त्याग कर दिया ।

लोगों ने खुद को पुलिस, सेना और लोक सेवा से अलग कर लिया,

मतलब जो भी इन सेवाओं में थे उन्होने अपने-अपने पद त्याग दिया ।

वकीलों से सरकारी कोर्ट न जाने की बात की गई ।

इस तरह असहयोग आन्दोलन पूरे चरम पर था लेकिन तभी एक हिंसक अनहोनी घट गई ।

और घट गई चौरी चौरा की घटना 

असहयोग आन्दोलन गोरखपुर मे प्रगति पर था ।

2 फरवरी 1922 को आंदोलन कारी गोरखपुर  के चौरी चौरा में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे,

कि तभी पुलिस ने आन्दोलन करने वालों को बेरहमी से पीटने के बाद जेल में बंद कर दिया ।

ध्यान देने की बात यह है कि उस समय थानेदार गुप्तेश्वर सिंह थे ,

जिन्होने भगवान् अहीर नामक व्यक्ति को लाठी से पीटा था ।

चौरी चौरा कांड इसी के बदले में हिंसक हो गया और 23 पुलिस वाले जला दिए गए थे ।

पांच फरवरी 1922 को ढाई हजार लोगों ने चौरी चौरा थाने को घेरकर आग लगा दी थी ।

इसके पहले पुलिस ने भी तीन लोगों को गोली मार कर जान लेली थी ।

भीड़ द्वारा लगाई आग से महिलाओं, बच्चों समेत 23 लोग मारे गए थे ।

यह सुनकर गांधी जी बेहद आहत हुए थे ।

उन्होने 12 फरवरी 1922 को तत्काल इस आन्दोलन को ,

खत्म करने की घोषणा कर दी ।

यद्यपि गांधी जी के इस कदम की बेहद आलोचना की गई,

लेकिन गांधी जी अपने वचन पर कायम रहे और हिंसक हुए आन्दोलन को ही खत्म कर दिया ।

अब आइए आज की बात करते हैं 

आज की तारीख में इस सच्चाई की बात करें तो ,

हमें अपनी करतूत पर शर्म आती है।

आज हमारे आन्दोलन कतई आन्दोलन नहीं होते ,

बल्कि सच कहें तो यह अराजकता के अलावा कुछ भी नहीं होते ।

आजादी के बाद विशेष तौर पर जब से हमारे देश में ,

आरक्षण नामक मलाई खाने की सुविधा सार्वजनिक हुई है ।

तब से हम लगभग बौखला से गए हैं ।

आन्दोलन के नाम पर हमने बीस साल में केवल अराजकता की है ।

इस अमानवीय अत्याचार बनाम अराजकता उर्फ,

तथाकथित  आंदोलन के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :

जाट आन्दोलन

आरक्षण पाने के लिए यह आन्दोलन 2016 में हुआ था ।

जो वास्तव में सिरे से असंवैधानिक था ।

लेकिन दोगली राजनीतिकरण के चलते यह दिल्ली ,हरियाणा,यूपी में खूब फला फूला ।

परिणामस्वरूप इस अराजकता में 340 अरब रुपए का नुकसान हुआ ।

रेलवे को 60 करोड़ का घाटा अलग हुआ ।

गुर्जर आन्दोलन

गुर्जर आन्दोलन या अराजकता 2008 में हुई ।

गुर्जर समुदाय आज भी संविधान में पिछड़ा वर्ग में है,

लेकिन गद्दार नेताओं की उकसाने पर ये स्वयं को अनुसूचित जाति की दर्जा मांग करना शुरू हो रहा है।

23 मई 2008 को यह हिंसक अराजकता में बदल गया था।

इस हिंसा में लगभग 40 लोग मारे गए थे

पटेल आन्दोलन

14 लोगों की मौत, 20 9 करोड़ रुपये का नुकसान, ,

27 नागरिकों के साथ-साथ, 203 पुलिस वाले घायल हो गए।

यह इस आंदोलन का रिपोर्ट कार्ड है।

भाईयो बहनों अराजकता की लाइन बहुत लम्बी है।

कापू आन्दोलन, राम रहीम भयानक बवाल,

फिल्म पद्मावती का,नफरमानी कंड और,

अभी अभी सबसे झूठा  दलित आन्दोलन,

लगातार बढ़ती अराजकता का धवल साक्ष्य और,

आन्दोलन को बदनाम करने वाली अराजकता है । 

 मैं  इन सबका  विरोध करता  हूं,

क्योंकि मेरा मानना है कि अपनी उचित बात कहने के लिए,

यदि आप उचित साधन नहीं अपनाते ।

तो यह कतई आप की स्वार्थ की पूर्ति तो कर सकता है,

किसी देश के तमाम नागरिकों का भला नहीं कर सकता ।

 

 धन्यवाद

लेखक: के पी सिंह

08042018

 

5 COMMENTS

  1. यह वैश्विक नही घरेलू पूंजी है। बल्कि मुझे लगता है DNA से सम्बंधित पूंजी है आंदोलन व अराजकता। पहले देव -दानवों में,सुर असुरों में, ये अराजकता व आंदोलन होती थी पिसती जनता ही थीं।
    मध्यकालीन छोटे छोटे राजाओं , कबिलेदारो, में ये पूंजी अपनाखेल करती थी। आज इसका मॉडर्न स्वरूप आ गया ह अपने ही कपड़ो को कुल्हाड़ी से धोना शुरू करदो कुछ तो परिणाम मिलेगा।

  2. 🇮🇷 जय भारत दोसतो india मे रहते तो हामे कुछ करना
    हेै हाम भी कुछ बानना चाहते हेै जाय भारत

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