समाज शास्त्र का अन्य विषयों से संबंध

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समाज शास्त्र का अन्य विषयों से संबंध 

समाज शास्त्र का अन्य विषयों से संबंध क्या है? कैसा है? क्यों है?

इन तमाम प्रश्नों को यदि आप हल करना चाहते हैं

तो आपको इस लेख को शुरू से अंत तक पढना होगा।

क्योंकि यह सच है  कि समाज शास्त्र एक ऐसा विषय है, 

जिसका हर विषय से कुछ न कुछ लेना देना जरूर जान पड़ता है। 

समाज शास्त्र की सच्चाई यह है कि हर विषय का संबंध इससे  है तो

इसका भी हर विषय से संबंध जरूर है यानी हर विषय इससे संबंधित है।

लगभग जीवन की हर गतिविधि में इस विषय के शामिल होने के कारण, 

समाज शास्त्र भारतीय समाज के कण कण में विद्ममान है।

अगर हम ध्यान    से  देखें तो समाज में कोई ऐसी चीज  नहीं बचती   जिससे  समाज न बनता हो।

इसका दूसरा पहलू यह भी है कि ऐसा कोई विषय नहीं है,

जिसका संबंध समाज और उसके अंतर्गत आने वाले संबंधों के जाल से नहीं है। 

 

समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र का संबंध 

इन दोनों शास्त्रों के संबंधों के बारे में सिल्वर मैन ने कुछ इस तरह निष्कर्ष निकाला है कि,

सामान्य कार्यों या लक्ष्यों के लिए हम इसे यानी

अर्थ शास्त्र को समाज शास्त्र की एक शाखा माना जा सकता है।

थामस ने भी इसी तरह कहा है कि अर्थशास्त्र वास्तव में समाज शास्त्र की एक शाखा है।

अर्थ शास्त्र में मानव की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है,

तो वहीं समाज शास्त्र में मनुष्य के जीवन के सभी पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।

मैकाइवर पेज ने  लिखा है कि,, “आर्थिक घटनाएं

सदैव सभी प्रकार की सामाजिक आवश्यकताओं एवं क्रियाओं से निर्धारित होती हैं।

मैक्स वेबर, कार्ल मार्क्स आदि विद्वानों ने अपने

अपने अध्ययन के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया है

कि आर्थिक और सामाजिक कारकों में   बड़ा ही घनिष्ठ संबंध है।

आज अर्थ शास्त्र में समाज शास्त्र के कुछ तत्वों का समावेश करके ही,

मानव कल्याण अर्थ शास्त्र की अंतर्राष्ट्रीय स्तर में परिकल्पना की जाती है।

काम्टे, जे एस मिल पैरेटो, बेब्लान, कार्ल मार्क्स , मैक्स वेबर, महात्मा गांधी, 

 ये सभी महान अर्थ शास्त्री होने के साथ ही साथ बहुत बड़े समाज शास्त्री भी रहे हैं।

निष्कर्ष स्वरुप यह कहा जा सकता है कि जिस तरह से,

बिना अर्थ के जीवन शून्य है उसी तरह से ही बिना समाज के जीवन शून्य है। 

कुछ अंतर भी हैं 

यद्यपि समाज शास्त्र रूपी वृक्ष के नीचे हर विषय रूपी पौधा संरक्षण पाता है

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि समाज शास्त्र के अलावा, 

किसी अन्य सब्जेक्ट का अस्तित्व ही नहीं है।

दुनिया में तमाम विषयों की स्थापना केवल मनुष्य को शिक्षित करने के लिए,

या फिर जीवन को सुव्यवस्थित करने के लिए कई गई है।

कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि बहुत सारे विषय एक दूसरे से मेल खाते हैं,

लेकिन फिर भी वे एक दूसरे के गुलाम नहीं हैं।

उनका अपना अस्तित्व होने के कारण ही किन्हीं भी दो विषयों के बीच अंतर स्वाभाविक है।

इसी तरह समाज शास्त्र और अर्थ शास्त्र विषयों के बीच भी कुछ अंतर है।

इस अंतर को हम निम्नलिखित ढंग से स्पष्ट कर सकते हैं।

🔴समाज शास्त्र का मूल उद्देश्य समाज और उस के अस्तित्व को,

बनाए रखने वाले सामाजिक संबंधो की पड़ताल करना, 

और उनके तमाम सवालों के समुचित जवाब तलाशना है।

शायद इसी लिए आज आधु युग में हर सामाजिक

समस्या के संदर्भ में समाज शास्त्रीय विवेचना की अपेक्षा की जाती है।

🔴जबकि अर्थ शास्त्र का मूल उद्देश्य मनुष्य की आर्थिक गतिविधियों को, 

अधिक से अधिक मानव हित में अनुप्रेरित करना है।

मनुष्य के समस्त हितों को किस तरह से इस अर्थ शास्त्र के जरिए प्राप्त किया जाए, 

इसी लक्ष्य को पाना अर्थ शास्त्र का मूल होता है।

इसको  जरा इस तरह भी समझा जा सकता है कि

समाज शास्त्र का मूल उद्देश्य सुव्यवस्थित समाज की स्थापना है,

तो अर्थ शास्त्र का मूल उद्देश्य मनुष्य के व्यवस्थित समाज की आर्थिक स्थिति को नियंत्रित करना है।

समाज शास्त्र और इतिहास का संबंध 

इतिहास की सैकड़ों प्रासंगिक परिभाषाओं और उनके मूल अर्थ की सम्यक विवेचना के अनुसार

इतिहास महज बीते कल की लिखित अलिखित डायरी नहीं है,

बल्कि भविष्य को सुरक्षित और सुव्यवस्थित अर्थ प्रदान करने का एक अनुभव युक्त व्यौरा होता है।

देखा जाए तो इतिहास में समाज और समाज में इतिहास घुले मिले होते हैं।

हम किसी भी ऐसे समाज की कल्पना नहीं कर सकते जिसका कोई इतिहास ही न हो,

ठीक उसी तरह तरह हम किसी भी ऐसे इतिहास

की कल्पना नहीं कर सकते कि जिसका  अपना कोई समाज न रहा हो।

दुनिया के हर इतिहास में समाज का एक अस्तित्व होता है,

उसी तरह दुनिया के हर समाज का अपना एक इतिहास होता है,

जिसको वह अपने विकास की कुंजी की तरह इस्तेमाल करता है।

हम अपने वर्तमान समाज को इतिहास की सीखों से और भी बेहतर बना सकते हैं,

तो समाज की वर्तमान अवधारणा  और अस्तित्व से,सैकड़ों सालों से दबे पड़े,

इतिहास की तमाम मानव हित अहित से संबंधित पर्तें खोल सकते हैं।

कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि इस प्रकार यह समाज शास्त्र और इतिहास का,

एक  दूसरे  से जुड़े होना भी मानव  हित का एक प्राकृतिक मेल है। 

दोनों में अंतर 

समाज शास्त्र और इतिहास एक दूसरे पर आश्रित

हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों में कोई भी अंतर नहीं है।

दोनों में साम्य होने के बाद भी कुछ जरूरी अंतरों को हम निम्नलिखित ढंग से स्पष्ट कर सकते हैं।

🔴समाज शास्त्र का मूल उद्देश्य समाज को सुव्य- वस्थित बनाने के लिए,

उसकी बदलती हकीकतों का विश्लेषण करना भी होता है।

🔴जबकि इतिहास का मूल उद्देश्य भूतकाल की तमाम सूक्ष्मताओं का वर्णन,

इस तरह करना होता है कि हम वर्तमान में जीवन यापन करने वाले प्राणी उससे कुछ सीख सकें। 

समाज शास्त्र और दर्शन शास्त्र 

समाज शास्त्र का मूल उद्देश्य सामाजिक संबंधों के जाल का अध्ययन करना है,

जबकि दर्शन शास्त्र का मूल उद्देश्य मनुष्य के अस्तित्व की सम्यक विवेचना है।

दर्शन शब्द का अर्थ देखना होता है अर्थात मनुष्य के अस्तित्व को सूक्षमता से देखना ही दर्शन है,

और जिस विषय के अंतर्गत यह पढाया जाता है उसे हम दर्शन शास्त्र कहते हैं।

हम समाज शास्त्र में भी मनुष्य का समाज के जरिए अवलोकन करते हैं।

देखा जाए तो दोनों विषयों का अंतिम लक्ष्य मनुष्य के लिए बेहतर समझ विकसित करना है।

यही इन दोनों विषयों की समानता है और यही इन दोनों को आपस में मिलाता भी है। 

दोनों में अंतर भी देखा जा सकता है 

दोनों विषयों में अंतर यह है कि समाज शास्त्र जहां मानव समाज के वाह्य भाग की विवेचना करता है,

तो दर्शन शास्त्र मानव के अस्तित्व की आंतरिक विवेचना करता है।

समाज शास्त्र का अध्ययन विषय मनुष्य के अपने सामाजिक संबंध हैं,

तो दर्शन शास्त्र का विषय मनुष्य की आंतरिक सोच और मान्यता है।

बावजूद इन तमाम सच्चाईयों के हकीकत यह है कि समाज से संबंध रखने वाले,

मनुष्य के लिए इन दोनों विषयों का अपना महत्व है। 

धन्यवाद

KPSINGH 05072018

 

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