समाज शास्त्र का विषय-क्षेत्र

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समाज शास्त्र का विषय क्षेत्र 

समाज शास्त्र के विषय क्षेत्र के संबंध में विद्वानोंके मतों को, हम  मुख्य रूप से दो भागों में बांट सकते हैं।

🔴स्वरूपात्मक सम्प्रदाय

🔴समन्वयात्मक सम्प्रदाय

स्वरूपात्मक सम्प्रदाय को विशेषात्मक सम्प्रदाय भी कहते हैं।

इसे विशिष्टतात्मक अथवा यथारूपेण सम्प्रदाय या फिर जर्मन सम्प्रदाय कहा जाता है।

समन्वयात्मक  सम्प्रदाय को समाज शास्त्र के अंत र्गत सारात्मक सम्प्रदाय कहा जाता है।

इस सम्प्रदाय को दूसरे शब्दों में सामान्य विचार धारात्मक,

या फिर विश्वकोषात्मक सम्प्रदाय अथवा अंत मे फ्रांसीसी सम्प्रदाय कहा जाता है। 

स्वरूपात्मक सम्प्रदाय 

इस सम्प्रदाय के समर्थक जार्ज सिमेल हैं, साथ ही

वीरकांत, वानवीज, मैक्सवेबर, और टानीज ने भी इसका समर्थन किया है।

🔴मैक्सवेबर के अनुसार, “समाज शास्त्र सामाजिक क्रियाओं का अध्ययन है।” 

समन्वयात्मक सम्प्रदाय 

समन्वयात्मक  सम्प्रदाय के प्रमुख  समर्थकों  में

सोरोकिन, दुर्खीम, हाबहाउस तथा गिन्सबर्ग आदि उल्लेखनीय हैं।

यह सम्प्रदाय समाज शास्त्र को एक सामान्य विज्ञान बनाने पर जोर देता है।

🔴स्माल के अनुसार समाज शास्त्र का विषय क्षेत्र सामाजिक संबंधों, व्यवहारों

, गतिविधियों आदि के जननिक स्वरूपों का अध्ययन है। 

समाज शास्त्र कुछ तथ्य कत्थय 

 

🔴कार्ल मैनहीम के अनुसार समाज शास्त्र को दो भागों में बांट सकते हैं।

               🔮क्रम बद्ध और सामान्य समाज शास्त्र                        🔮ऐतिहासिक समाज शास्त्र 🔴भारत में सबसे पहले 1914 में मुम्बई के विश्व

विद्यालय में स्नातक स्तर पर समाज शास्त्र का अध्ययन कार्य फिर प्रारंभ हुआ था।

 

🔴काम्टे के अनुसार समाज शास्त्र एक स्वतंत्र विज्ञान है।

🔴 काम्टे सदैव इसे विज्ञान मानने के पक्ष में रहे थे।

काम्टे ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने समाज शास्त्र को

विज्ञानों की रानी या विज्ञानों की राज माता कहा है।

🔴सी डब्ल्यू मिल्स ने समाज शास्त्र को विज्ञान मानने की अपेक्षा एक क्राफ्ट मानने के पक्ष में थे।

🔴मैकाइवर पेज के अनुसार, “समाज शास्त्र

सम्बद्धता के सिद्धांत और सामाजिक संरचना में व्यवस्था को ज्ञात करने का प्रयत्न है”।

🔴बेबर  के  अनुसार  समाज शास्त्र  सांसारिक मानव का

व्याख्यात्मक अवबोधन कराने का प्रयत्न करता है।

🔴इसी तरह हावेल के अनुसार समाज शास्त्र

सामाजिक संबंधों, उनकी विविधता और स्वरूपों का वैज्ञानिक अध्ययन है।

🔴आगबर्न के अनुसार समाज शास्त्र ज्ञान की वह शाखा है जो समाज के बारे में बताती है,

तथा उन तरीकों को भी बताती है जिनसे समाज उत्तम बने।

🔴स्थिति मूलक और गति मूलक अवधारणाओं का प्रतिपादन काम्टे ने किया था।

🔴भारत में समाज शास्त्र प्रारंभ में धर्म शास्त्र से प्रभावित था।

🔴मैलिनोवस्की के अनुसार धर्म को हम  समाज

शाश्त्रीय घटना के साथ साथ व्यक्तिगत अनुभव भी मान सकते हैं। 

धन्यवाद

KPSINGH 02072018

 

 

 

 

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