समाज शास्त्र की मूल अवधारणाएं

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समाज शास्त्र की मूल अवधारणाएं 

समाज  शास्त्र की मूल  अवधारणाएं नामक इस

लेख में हम, 

समाज शास्त्र की मूल अवधारणाओं के बारे में

जानकारी हासिल करेंगे।

इतना ध्यान रहे कि जब हम समाज शास्त्र की मूल

अवधारणाओं की बात करते हैं तो, 

इसका मतलब समाज, समुदाय, समिति साथ ही संस्था आदि से होता है ।

प्रस्तुत लेख यानी इस लेख में हम समाज शास्त्र

की मूल अवधारणाओं के बारे में ही चर्चा करेंगे।

क्योंकि समाज शास्त्र के विद्यार्थियों को यह बहुत अच्छे से पता है कि,

समाज शास्त्र से संबंधित किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में,

बिना मूल अवधारणाओं की जानकारी के कुछ भी

होने वाला नहीं है ।

दोस्तों, फिर आइए बिना देरी किए अब हम अपने आज के खास टापिक ,

समाज शास्त्र की मूल अवधारणाओं के बारे में ही चर्चा करते हैं कुछ इस तरह,,,,, 

समाज क्या है? 

 

समाज शास्त्र की मूल अवधारणाओं में सबसे ही

महत्वपूर्ण अवधारणा समाज की है।

इसलिए यहां यह विचार करना नितांत आवश्यक

है कि आखिर समाज क्या है?

व्यक्ति के बीच पाए जाने वाले सामाजिक संबंधों

के आधार पर निर्मित व्यवस्था को ही समाज कहा गया है।

मैकाइवर  एवं  पेज  के अनुसार, “समाज रीतियों

एवं कार्य प्रणालियों की अधिकार एवं पारस्परिक

सहायता की,  अनेक समूहों तथा  विभागों की,

मानव व्यवहार के नियंत्रणों तथा स्वतंत्रताओं की एक व्यवस्था है,

इस सदैव परिवर्तन शील, जटिल व्यवस्था को हम समाज कहते हैं ।

यह सामाजिक संबंधों का जाल है और यह सदैव

परिवर्तित रहता है।

🔴स्पेंसर के अनुसार समाज एक अधिजैवकीय समग्र है।

🔴गिडिंग्स के अनुसार समाज स्वयं एक संघ है  एक संगठन है।

औपचारिक संबंधों का योग है  जिसमें सहयोगी

व्यक्ति परस्पर संबद्ध हैं ।

गिडिंग्स ने समानता की चेतना को समाज का आधार माना है।

मैकाइवर एवं पेज का तो यहां तक कहना है कि

जहां कहीं भी जीवन है वहीं समाज है।

गिलिन एवं गिलिन के विचारों की बात करें तो वह

कहते हैं कि समाज तुलना रूप से सबसे बड़ा और स्थाई समूह है।

जबकि मैक्सवेबर का कहना है कि समाज के बारे

में विकास वाद का सिद्धांत ही सबसे सही है ।

समाज  एक जीवन  रचना के  समान  है यह विचार

स्पेंसर के हैं ।

जबकि  दुर्खीम के अनुसार  समाज ही  वास्तविक

देवता है।

मैकाइवर  एवं पेज  ने समूह  की भी  अपनी अहम

परिभाषा में सामाजिक संबंधों पर बल दिया है । 

समुदाय क्या है? 

 

वह समाज जो किसी निश्चित भौगोलिक स्थान में  रहता है समुदाय कहा जाता है।

लिटिल कम्युनिटी  नामक अपनी किताब में राबर्ट

रेडफील्ड ने लघु समुदाय की चार विशेषताओं को बताया है।

 ये हैं

🔴लघुता 

🔴विशिष्टता

🔴आत्म निर्भरता

🔴समरूपता ।।

ध्यान रखें लघु समुदाय की अवधारणा के जनक राबर्ट रेडफील्ड हैं।

समुदाय के बारे में बोगार्डस का कहना है कि लघु समुदाय 

एक ऐसा सामाजिक समूह है जिसमें कुछ मात्रा में हम की भावना पाई जाती है   

तथा वह एक निश्चित स्थान में निवास करता है।

आगबर्न एवं निमकाफ के हिसाब से समुदाय एक सीमित क्षेत्र में 

सामाजिक जीवन का एक स्वाभाविक व लोक ग्राम संपूर्ण संगठन है।

लोक ग्राम नगर सातत्य की अवधारणा भी रेडफील्ड की देन है 

लिटिल कम्यूनिटी एवं पीजेंट सोसाइटी के लेखक लोवी हैं। 

 🔴गांव को लघु गणराज्य मेटकाफ ने कहा है। 🔴भारतीय गांव को एक जीवन विधि डॉ मजूम ने कहा है।

🔴बोगार्डस का कथन है कि गांव के लोग सत्य बोलते हैं और बड़े भोले होते हैं। 

 

धन्यवाद

KPSINGH15072018 

 

 

 

 

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