भारत की वैदिक सभ्यता :भाग 2

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भारत की वैदिक सभ्यता भाग 2

भारत की वैदिक सभ्यता भाग एक में आपने जो कुछ भी जाना ,

यहां पर उसके बाद की अगली सच्चाई क्रमशः रखी गई है ,

ताकि आपको अध्ययन में किसी भी तरह की कोई परेशानी न हो ।

आइए जानते हैं भारत की वैदिक सभ्यता के कुछ और खास तथ्य

जो हमें जीवन में कहीं भी, कभी भी काम आ सकते हैं ।

भारतीय वैदिक सभ्यता और परिवार 

भारत की वैदिक सभ्यता में ऋगवैदिक काल की ,

सबसे छोटी इकाई परिवार या कुल होती थी ।

परिवार के लिए ग्रह शब्द प्रयुक्त हुआ है ।

ऋगवैदिक समाज पितृ सत्तातमक समाज था ।

पिता या बड़ा भाई परिवार का प्रमुख होता था ।

पिता के अधिकार असीमित होते थे ।

वैदिक सभ्यता के सामाजिक, जीवन में पिता दंड का पारिवारिक अधिकारी था

यानी वह किसी को कुछ भी दंड देने में सक्षम होता था ।

वरुण सूक्त के अनुसार पिता अपने पुत्र को बेंच भी सकता था ।

वर्ण व्यवस्था और समाज 

ऋगवैदिक कालीन समाज प्रारंभ में वर्ण विहीन समाज था ।

सभी व्यक्ति जन के सदस्य समझे जाते थे ।सब की समान सामाजिक प्रतिष्ठा थी ।

जन के निर्माण के पूर्व लोगों को अर्य तथा कृष्टि कहा जाता था ।

ऋग्वेद में वर्ण शब्द रंग के अर्थ में, कहीं कहीं व्यवसाय के चयन के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है ।

ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में सर्व प्रथम शूद्र शब्द का प्रयोग किया गया है ।

इसमें विराट पुरुष के विभिन्न अंगों से चार वर्णों की उत्पत्ति बताई गई है ।

मुख से ब्राह्मण भुजाओं से राजनय क्षत्रिय पेट से वैश्य तथा पैर से शूद्र का जन्म माना जाता है ।

आर्यों ने गैर आर्यों को अपनी ओर से कई नाम दिया था,

जैसे : अब्राहम यानी वेदों को न मानने वाला ।

अयज्ञन :यज्ञ न करने वाला ।

अनासः बिना नाक वाला ।

देवताओं को न मानने वाले ।

वैदिक व्रतों का पालन न करने वाले ।

कटु वाणी वा

स्त्रियों की दिशा और दशा

 

शतपथ ब्राह्मण में पत्नी  को अर्धांगिनी कहा गया है ।

ऋग्वेद में जाये दस्तम अर्थात पत्नी ही ग्रह कहा गया है ।

कन्या की विदाई के समय उसको दिए जाने वाले उपहार वहतु कहलाते थे ।

स्त्रियों में पुनर्विवाह या नियोग प्रचलित था ।

नियोग से उत्पन्न बालक क्षेत्रज कहलाता था ।

सती प्रथा का प्रचलन नही था ।

जीवन भर कुंवारी रहने वाली लड़कियां अमाजू कहलाती थीं।

ऋग्वेद में घोसा अपाला लोपा मुद्रा शिक्षित महिलाएं थीं ।

भोजन और वस्त्र की उपलब्धता 

आर्य शाकाहारी और मांसाहारी दोनो ही थे ।

भोजन में दूध घी दही का विशेष महत्व था ।खीर का उल्लेख मिलता है ।

जौ की सत्तू और दही से करंभ नामक भोजन बनता था ।

ऋगवैदिक काल में तीन प्रकार के वस्त्र वर्णित हैं ।

इनके नाम थे ।

नीवी वासस  अधिवासस ।

स्त्री-पुरुष  दोनों  आभूषण पहनते थे ।

आमोद प्रमोद की स्थित

लोगों में आमोद प्रमोद का प्रचलन था ।

रथ दौड़, घोड़ा दौड़ का प्रचलन था ।

पासा भी प्रचलित था ।

जुआ भी खेला जाता था ।

झांझ मजीरे ,दुदुभी ,वीणा ,बांसुरी का उल्लेख है ।।

कृषि एवं पशुपालन की स्थिति 

आर्य संस्कृति मूलत: ग्रामीण थी ।

कृषि एवं पशु जीवन का आधार था ।

पशुपालन की अपेक्षा कृषि का उल्लेख कम मिलता है ।

केवल 24 मंत्र ही ऋग्वेद में कृषि विषयक हैं ।

उद्योग एवं व्यापार की दशा 

व्यवसाय आनुवांशिक नहीं थे ।

बढई स्वर्णकार, चरमकार ,जुलाहे ,करमाकर का उल्लेख है,

कताई बुनाई स्त्री-पुरष दोनों करते थे ।धार्मिक जीवन में बहुदेववाद उल्लेखनीय है ।

देवताओं की संख्या तीन बताई जाती है ।एक अन्य स्थान पर कुल 33 है ।

देवताओं की संख्या तीन वर्गों में है ।

पृथ्वी के देवता आकाश के देवता अंतरिक्ष के देवता ।।।

 

धन्यवाद

KPSINGH 29032018

 

 

 

 

 

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