क्या पृथ्वी पर जीवन खत्म हो सकता है?

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क्या पृथ्वी पर जीवन खत्म हो सकता है? 

क्या पृथ्वी पर जीवन खत्म हो सकता है? हो सकता है कि इस सवाल को पढ़ कर अपने होश उड़ जाए,

या फिर हो सकता है कि आप इसे पढ़कर एक मजाक समझ लें।

लेकिन ज़रा ठहरिए, होश उड़ जाए तो कोई बात नहीं है लेकिन यह मजाक कतिई नहीं समझना।

क्योंकि यह आशंका है कि क्या पृथ्वी पर जीवन खत्म हो सकता है?

किसी गली या नक्कड़ के किसी आम आदमी या फिर किसी मसखरे के प्रकार के आदमी की नहीं है,

बल्कि यह आशंका दुनिया के जाने माने वैज्ञानिकों की है।

क्या कहना है वैज्ञानिक? 

वैज्ञानिकों का कहना है कि करोड़ों साल पहले मंगल ग्रह पर वायुमंडल था,

लेकिन वहां के चुंबकीय क्षेत्र की धीरे-धीरे समाप्त होने से सौर तूफानों ने उसे तबाह कर दिया।

अब आशंका यह है कि ऐसा ही कुछ हमारे पृथ्वी पर होने वाला है।

यही खतरा अब पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में पैदा होने वाला है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी के चुंबकीय ध्रुव पलट हो सकते हैं।

सूर्य की हानि किरणें वायुमंडल को चीरते हुए सतह पर आ सकती हैं ।

फलस्वरूप मंगल की ही तरह धरती का वायुमंडल भी खत्म हो सकता है ।

पृथ्वी के कोर में हलचल 

वैज्ञानिकों के मुताबिक पृथ्वी के कोर में मौजूद तरल लोहा विशालकाय इलेक्ट्रिको मैगनेटिक की तरह व्यवहार करता है ।

जिसके दो चुम्बकीय ध्रुव हैं ।

इससे इलेक्ट्रो मैग्नेटिक करंट पैदा होता है ।

जो पृथ्वी के चारों ओर एक चुम्बकीय क्षेत्र मोगने टोसफेयर तैयार करता है।

अंतरिक्ष में हजारों मील तक फैला यह चुम्बकीय क्षेत्र सूर्य की घातक किरणों से पृथ्वी की बचाता है ।

धरती पर मौजूद जीवन इसी कवच पर निर्भर करता है ।

यदि किसी भी तरह से यह कवच नष्ट हुआ तो पृथ्वी के नष्ट होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा ।

जल्द दिखेगा असर 

पुराने अध्यन के मुताबिक पृथ्वी के इतिहास में हजारों बार चुम्बकीय क्षेत्र में बदलाव आया है ।

धरती के कोर में मौजूद तरल लोहा स्थिर नहीं है ।

इसके कारण पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी चुम्बकीय ध्रुव हर दो या तीन लाख वर्ष में आपस में जगह बदल लेते हैं ।

यूरोपीय स्पेस एजेंसी के उपग्रहों द्वारा एकत्र किए गए डाटा के मुताबिक हर दशक में पृथ्वी का चुम्बकीय कवच पांच फीसदी की दर से कमजोर हो रहा है ।

यह दर पूर्वानुमान से 10 गुना ज्यादा है ।

कुछ अध्ययनों के मुताबिक पिछली बार यह बदलाव 7•80 लाख वर्ष पहले हुआ था ।

इस प्रक्रिया में चुम्बकीय क्षेत्र धीरे धीरे कमजोर होता है ।

वैज्ञानिकों का दावा है कि अगला बदलाव प्रारंभ हो चुका है ।

भयावह परिणाम 

दक्षिणी अमेरिका के ऊपर मौजूद चुम्बकीय क्षेत्र सबसे तेजी से कमजोर पड़ रहा है ।

इस क्षेत्र को वैज्ञानिकों ने दक्षिण अटलांटिक असंगति नाम दिया है ।

इस क्षेत्र के ऊपर से गुजरने वाले उपग्रहों के सर्किट रेडिएशन बढ़ जाने के कारण खराब हो गए हैं ।

अमेरिका कोलराडो स्थित यूनिवर्सिटी आफ कोल राडो के अंतरिक्ष विभाग के वैज्ञानिकों का कहना है कि ,

अगर यह सारे संकेत सही हैं तो चुम्बकीय क्षेत्र के पलटने के बाद पृथ्वी के कुछ क्षेत्र रहने लायक नहीं बचेंगे ।

घट रही क्षमता

भारत के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के वैज्ञानिकों ने

एक वर्ष बाद दावा किया है कि घातक किरणों ने

पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को पीछे धकेल दिया है ।

यह क्षेत्र जो पृथ्वी के अर्ध व्यास का 11 गुना अधिक था वह अब सिर्फ चार गुना बचा है ।

तीन साल पहले मिला संकेत

2015 में सूर्य से निकलने वाली तीव्र किरणों सुपर स्टार्म की स्थित खड़ी कर दी ।लगातार दो घंटों तक घातक किरणों  के बरसने से

पृथ्वी के मैग्नेटिक स्फेयर में अस्थाई दरारें पड़ गई ।

प्रकाश की गति से भी तेज रेडिएशन पृथ्वी पर हुआ ।

उनसे वातावरण में जियो मैग्नेटिक तूफान उठा ।

ध्रुवों के करीब क्षेत्रों में  रेडियो सिग्नल ठप  पड़ गया ।

दो अलग मत 

वैज्ञानिकों ने एक समूह के मुताबिक ध्रुव पलटने से सौर विकिरण दो गुना हो जाए।

इस से हर साल कैंसर जैसी बीमारी से एक लाख लोगों की जान हो सकती है।

दूसरे समुदाय का कहना है कि चुंबकीय परत को भी कमजोर पड़ता है, लेकिन सौर विकिरण में मामूली वृद्धि होगी

कमजोर कवच के बाद भी पृथ्वी पर घना वातावरण सूर्य की घातक किरणों को रोकना।

 

धन्यवाद

लेखक: के पी सिंह

29032018 

 

 

 

 

 

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